93 मुंबई ब्लास्ट की अगली सुबह राकेश मारिया को कौन-से ‘किंग’ का फोन आया था?

12 मार्च, 1993. मुंबई शहर. डेढ़ बजे का वक्त. शहर में मार्च की दोपहरी वाला ही खालीपन था. मुंबई में जब राह चलते कंधे से कंधे न टकराएं, तो शहर को खाली ही माना जाता है. मगर ये खालीपन यूं ही नहीं था.

फिर इसी दिन तीन बजकर 40 मिनट का समय. इन दो घंटे 10 मिनट में मुंबई अपने सबसे खौफनाक दिनों में से एक का सामना कर चुकी थी. शहर में 12 बम ब्लास्ट हुए. करीब 10 से 15 मिनट के अंतर में एक के बाद एक, लगातार ब्लास्ट. होटल से लेकर प्लाज़ा सिनेमा तक. बाज़ार से लेकर बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज की पार्किंग तक ब्लास्ट. खून, मांस के लोथड़े, चीख-पुकार से पटी सड़कें. हर गुज़रते मिनट के साथ मरने वालों की संख्या बढ़ रही थी. पूरी मायानगरी के हाथ-पांव फूल चुके थे.

ऐसे हादसों के बाद सबसे पहली और सबसे बड़ी जिम्मेदारी हो जाती है शहर का ट्रैफिक और क्राउट मैनेजमेंट. सड़कें खाली कराना. लोगों को समझा-बुझाकर भीड़ को हटाना. ये सारा जिम्मा था डीसीपी ट्रैफिक राकेश मारिया पर.

स्पॉट पर पहुंचने वाले पहले डीसीपी लेवल ऑफिसर

राकेश मारिया को ब्लास्ट की पहली खबर मिली डेढ़ बजे. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज की पार्किंग में ब्लास्ट. कोई कुछ समझ पाता, कहीं पहुंच पाता, इससे पहले दूसरा ब्लास्ट- काठ बाज़ार में, तीसरा शिवसेना भवन के पास.

मारिया अपनी टीम के साथ राम गणेश गडकरी चौक पहुंचे, जहां शिवसेना भवन था. मारिया किसी भी ब्लास्ट स्पॉट पर पहुंचने वाले पहले डीसीपी लेवल ऑफिसर थे. यहां उन्होंने सबसे पहले भीड़ से बात की, ताकि लोगों को भड़कने से रोका जा सके. कहा-

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“आप लोग ऐसे भीड़ लगाकर खड़े रहेंगे, तो हम तो मूवमेंट ही नहीं कर पाएंगे. खुद भी शांत रहें, अपने साथ वालों को भी शांत कराएं. शहर में कई जगहों पर ब्लास्ट हो रहे हैं. हमारे बीच कॉम्युनल टेंशन पैदा करने की ये सोची-समझी साजिश है. हमें इस साजिश में फंसना नहीं है. दंगे नहीं होने चाहिए.”

Mumbai Blast 11
मुंबई बम ब्लास्ट के बाद की एक तस्वीर. (फोटो- India Today)

फौरी रिएक्शन को कंट्रोल करने में कामयाब

मारिया अपनी बात लोगों तक पहुंचाने में कामयाब रहे. डर तो था, लेकिन लोगों ने आपा नहीं खोया. प्लाज़ा सिनेमा में भी ब्लास्ट हुआ था. वहां भी मारिया पहुंचे, शिवसेना भवन के पास वाली बातें दोहराईं.

करीब तीन बजे मारिया ने एडिशनल कमिश्नर वाईसी पवार से मुलाकात की. बात की कि ब्लास्ट के बीच ट्रैफिक, क्राउड मैनेजमेंट और बंदोबस्त को कैसे संभाला जाए. यहां से निकले और काम पर लग गए.

सुबह-सुबह ‘किंग’ का कॉल

रात भर शहर की सड़कें खाली कराने, माहौल कुछ संभालने का काम जारी रहा. नतीजा- सुबह छह बजे तक मुंबई की सड़कें वापस चल पड़ी थीं. सबसे बड़ा हादसा झेलने के बाद शहर ने 24 घंटे में ही गज़ब की रिकवरी की. वो मुंबई वाली स्पिरिट.

लेकिन सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट अभी बाकी था. अपनी किताब Let me say it now में राकेश मारिया ने लिखा है कि सुबह साढ़े छह बजे के करीब ही उनके पास एक फोन कॉल आया. फोन था किंग के ऑफिस से. किंग, यानी मुंबई के पुलिस कमिश्नर अमरजीत सिंह सामरा. वायरलेस कॉल्स और कोड लैंग्वेज में उन्हें ‘किंग’ कहकर ही पुकारा जाता था. सामरा ने मारिया से कहा- फौरन मिलने आ जाओ.

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पहली बार सीपी, जॉइंट सीपी के सामने मारिया

मारिया वहां पहुंचे, तो सामरा के साथ महेश नारायण सिंह भी थे. जॉइंट सीपी (क्राइम) महेश नारायण. जबसे मारिया की मुंबई में पोस्टिंग हुई थी, तबसे ये पहला मौका था, जब वो एकसाथ सीपी और जॉइंट सीपी के सामने थे.

सामरा ने मारिया से हाल-चाल पूछा. ब्लास्ट को लेकर जो भी जानकारियां जुटी थीं, वो राकेश मारिया से शेयर कीं. मारिया मन ही मन सोच रहे थे कि मेरा काम तो ट्रैफिक और बंदोबस्त दुरुस्त करने का है, तो ये सब बातें मुझे क्यों बताई जा रही हैं.

सामरा ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा-

“राकेश, तुम जानते ही हो कि ब्लास्ट कितने सीरियस थे. इससे भी बड़ी दिक्कत ये है कि हमारे पास कोई क्लू नहीं है कि ये किसने किया, क्यों किया. ऐसे में वो (हमला करने वाले) फिर से हमला कर सकते हैं. लेकिन हम उनके ऐसा कुछ भी करने से पहले उन तक पहुंचेंगे. राकेश, मुंबई पुलिस की प्रतिष्ठा दांव पर है. हमने फैसला किया है कि इस केस की इन्वेस्टिगेशन तुम करोगे.”

सिर्फ 22 महीने में ही मुंबई की सबसे बड़ी जिम्मेदारी

13 मार्च, 1993 की तारीख को मुंबई शहर में सीरियल ब्लास्ट का केस सुलझाने से बड़ी ज़िम्मेदारी कोई नहीं थी. और ये ज़िम्मेदारी अब राकेश मारिया पर थी. राकेश मारिया, जिनको मुंबई जैसे शहर में काम संभाले अभी 22 महीने ही हुए थे. 12 महीने डीसीपी, जोन-4 के तौर पर और पिछले 10 महीने डीसीपी ट्रैफिक के तौर पर. मुंबई सीरियल ब्लास्ट केस के इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर.

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