साधारण किसान परिवार में जन्मे हार्दिक पटेल राज्य में प्रतिरोध का चेहरा बनकर उभरे

हार्दिक पटेल की अभी मुश्किल से चुनाव लड़ने की उम्र हुई है. लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के राजनीतिक व्यवहार से लगता है कि उन्हें बेहद गंभीरता से लिया जा रहा है. क्यों महत्वपूर्ण है हार्दिक पटेल?

गुजरात में लाखों लोगों को आरक्षण के लिए सड़क पर उतार देने वाले हार्दिक पटेल एक बार फिर सुर्खियों में हैं. अहमदाबाद के जीएमडीसी मैदान में 25 अगस्त 2015 को पाटीदार आरक्षण समर्थक रैली के बाद पूरे राज्य में हिंसा, तोड़फोड़ और आगजनी हुई थी. उसमें कई सरकारी बसें, पुलिस चौकियां व अन्य सरकारी संपत्तियां जलाई गईं, सत्तासीन दल के मंत्रियों के आवास पर तोड़फोड़ हुई. पुलिस ने आरोप-पत्र में हार्दिक व उनके सहयोगियों पर चुनी हुई सरकार गिराने के लिए हिंसा फैलाने का षड़्यंत्र करने का आरोप लगाया और उनके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज किया. उसी मामले में हार्दिक को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा गया है.

सात दिन जेल में रहने के बाद उनको रिहा कर दिया गया है. इसके बाद हार्दिक पटेल ने अपना संघर्ष जारी रखने की घोषणा की है.

हार्दिक पटेल भारत के राजनीतिक पटल पर ऐसे समय में छा गए, जब उनकी चुनाव लड़ने की उम्र भी न थी. पाटीदार आरक्षण समर्थकों का दावा था कि हार्दिक की अहमदाबाद रैली में लाखों लोग जमा हुए. अखबारों ने भी 5 लाख से ऊपर संख्या बताई. आरक्षण के समर्थन में ट्रैक्टर से लेकर मर्सिडीज और ऑडी जैसी लग्जरी गाड़ियों से लोग आए और उन्होंने आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.

आरक्षण विरोध से आरक्षण समर्थन और किसान नेता का सफर

हार्दिक के शुरुआती साक्षात्कारों में ऐसा लगता था कि वह आरक्षण को खत्म कराने की लड़ाई लड़ रहे हैं. शुरुआती दौर में उनकी रैलियों में ऐसे नारे लगाए गए कि पाटीदारों को आरक्षण दो या सभी तरह के आरक्षण खत्म करो. आंदोलन आगे बढ़ा तो हार्दिक पटेल सामाजिक न्याय, हिस्सेदारी और वंचितों की बात करने लगे. यहीं से हार्दिक पटेल गुजरात में लंबे समय से सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए खतरनाक नजर आने लगे.

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हार्दिक ने गुजरात के किसानों की दयनीय स्थिति मीडिया के सामने रखनी शुरू कर दी कि राज्य के किसान किस तरह से तबाह हुए हैं. किसानों की जमीनें छिन गई हैं. उनके बच्चों के पढ़ने के लिए स्कूल नहीं है. उनके उत्पादों के वाजिब दाम नहीं मिल रहे हैं. शहरों में रोजगार के लिए उनके पास कौशल नहीं हैं. उन्होंने लोगों को बताया कि गुजरात का सशक्त कृषक तबका इस समय तबाह है, जिसने सरदार बल्लभ भाई पटेल के पीछे बारदोली में फरवरी 1928 में खड़े होकर कर ताकत दिखाई थी और अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा था. आरक्षण के साथ-साथ किसानों का मसला भी हार्दिक के एजेंडे में जगह बना चुका था.

विपक्ष की राजनीति का पटेल चेहरा

स्वतंत्रता के बाद, गुजरात की राजनीति में ब्राह्मणों का वर्चस्व था. राज्य के पहले मुख्यमंत्री जिवराज नारायण मेहता बने, जो महात्मा गांधी के चिकित्सक थे. उन्होंने अंतर्जातीय विवाह किया और उनकी पत्नी हंसा जिवा मेहता  को बड़ौदा के महाराज सयाजीराव गायकवाड़ का समर्थन मिला. अलग गुजरात बनाए जाने की मांग में ब्राह्मण नेताओं की प्रमुख भूमिका थी और कांग्रेस ने राज्य में 2 मुख्यमंत्री भी बनाए, जिनकी 1931 की जनगणना के मुताबिक राज्य में 4 प्रतिशत आबादी है. इनके अलावा राज्य में पटेलों का ही प्रभुत्व बना रहा. बाद में कांग्रेस ने खाम की राजनीति (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी औऱ मुस्लिम) शुरू की. यही वह दौर है, जब राज्य में आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने मजबूत पैठ बनानी शुरू की और राज्य की राजनीति में पटेलों को अपने पक्ष में खींचना शुरू किया. कांग्रेस के बाद भाजपा के सत्ता में आने पर भी पटेलों का वर्चस्व बना रहा.

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भाजपा नेताओं केशूभाई पटेल और शंकर सिंह बाघेला के बीच कुर्सी की खींचतान में नरेंद्र मोदी को गुजरात में नाइट वाचमैन बनाकर भेजा गया. मोदी मुख्यमंत्री के रूप में जम ही रहे थे कि गोधरा में अयोध्या से लौट रहे 59 हिंदू तीर्थयात्रियों को जिंदा जला दिया गया. उसके बाद राज्य में भीषण दंगे हुए, जिसे रोकने में मोदी सरकार पूरी तरह विफल हुई. लेकिन इस प्रशासनिक विफलता को आरएसएस-भाजपा ने सफलता के रूप में पेश किया और नरेंद्र मोदी राज्य की राजनीति में स्थापित हो गए.

गुजरात में पटेलों की राजनीति हाशिए पर

नरेंद्र मोदी की हिंदू नेता के रूप में चमक बढ़ने के साथ राज्य में पटेल राजनीति हाशिये पर चली गई. किसानों की जमीनें बड़े पैमाने पर बड़े उद्योगपतियों के हाथों चली गई और सूक्ष्म और लघु उद्यमों में लगे लोग भी तबाह हो गए. 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री के रूप में पद भार संभालने के बाद भी राज्य में पटेल समुदाय का कोई बड़ा नेता उभरकर सामने नहीं आया और मोदी अपने प्रतिनिधि के माध्यम से ही सरकार चलाते रहे. बढ़ी बेरोजगारी, हताशा, किसानों की दुर्दशा के बीच आरक्षण की मांग उभरी और एक साधारण किसान परिवार में जन्मे हार्दिक पटेल राज्य में प्रतिरोध का चेहरा बनकर उभर गए.

राज्य में जब विधानसभा चुनाव हुआ तो हार्दिक की उम्र चुनाव लड़ने की नहीं थी. वह कांग्रेस में शामिल हो गए और पार्टी की राजनीति शुरू कर दी. उसके पहले पाटीदार अनामत संघर्ष समिति में भी कई विभाजन हुआ, हार्दिक के चरित्र पर उंगलियां उठाकर उनकी छवि बिगाड़ने की कोशिश हो चुकी थी. बावजूद इसके, 2017 के विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को गुजरात में पूरी ताकत झोंकनी पड़ी. ग्रामीण गुजरात ने भाजपा को पूरी तरह खारिज कर दिया, लेकिन शहरों के दम पर पार्टी किसी तरह से सत्ता पाने में सफल रही. उस समय कांग्रेस के पास राज्य में कोई बड़ा चेहरा नहीं था. हालांकि लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस कोई करामात न दिखा सकी और 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य में भाजपा ने कांग्रेस का पूरी तरह सफाया कर दिया.

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संभावनाओं भरा युवा व्यक्तित्व

हार्दिक पटेल इस समय गुजरात में कांग्रेस के प्रमुख युवा चेहरे हैं. उन्हें शीर्ष नेतृत्व का समर्थन हासिल है. गुजरात के ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस के जमीन खिसकने की खबरों के बीच वह गुजरात में पूरी तरह से सक्रिय हो गए हैं. वह किसानों, मजदूरों के मसलों पर कायम हैं. भाजपा को निश्चित रूप से यह अहसास है कि राज्य में समृद्ध किसान और बड़े पैमाने पर उद्योग चलाने वाले पटेलों की भूमिका राज्य के चुनाव में अहम है. ऐसे में हार्दिक पटेल राज्य में कांग्रेस के लिए एक मजबूत आधार बना सकते हैं.

संभवतः यही वजह है कि भाजपा सरकार हार्दिक पटेल के मामले में किसी तरह की चूक नहीं करना चाहती है. अगर कांग्रेस हार्दिक पटेल को परोक्ष रूप से राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में पेश करती है तो राज्य की बड़ी आबादी कांग्रेस की ओर मुड़ सकती है. संभव है कि अभी हार्दिक पर और हमले हों. इस बात की भी संभावना बनती है कि चुनाव के पहले हार्दिक पटेल को किसी मामले में सजा सुना दी जाए, जिससे वह चुनाव लड़ने योग्य न रह जाएं और कांग्रेस राज्य में उन्हें नेता के रूप में प्रस्तुत न कर पाए. सरकारी मशीनरी के हार्दिक के पीछे लगने के इस रुख को एक सामान्य मामले के रूप में नहीं देखा जा सकता है.

(लेखिका राजनीतिक विश्लेषक हैं.यह लेख उनका निजी विचार है.)

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