लॉकडाउन: किसानों की प्रॉब्लम को अभी इग्नोर करेंगे, तो फिर विकास की फसल कैसे काटेंगे?

 लॉकडाउन: किसानों की प्रॉब्लम को अभी इग्नोर करेंगे, तो फिर विकास की फसल कैसे काटेंगे?

लॉकडाउन: किसानों की प्रॉब्लम को अभी इग्नोर करेंगे तो फिर विकास की फसल कैसे काटेंगे? Basti Khabar

देश में जैसे ही कोरोना वायरस के केस बढ़ने शुरू हुए, शहरों के ज्यादातर लोग चौकन्ने हो गए. घरों में आटा, चावल, दाल जैसी जरूरी चीजें जमा करने में जुट गए. ये सोचकर कि अगर लॉकडाउन लंबा चला, तो आटे-चावल के पैकेट खरीदेंगे कहां से? लेकिन अब असल समस्या कुछ और मालूम पड़ रही है. सवाल ये कि अगर किसान खेतों में तैयार फसल काट नहीं पाए, अगर जैसे-तैसे काट भी लिया और मार्केट तक पहुंचा नहीं पाए, तो? ‘दी लल्लनटॉप’ ने किसानों और हर आदमी से जुड़े इस मसले की जड़ तक पहुंचने की कोशिश की. किसानों से बात करके ये पता लगाया कि कहां, क्या चल रहा है.

दिक्कत क्या है भई?

दरअसल, मोबाइल और इंटरनेट में खोए रहने वाले लोग इस दिक्कत से बेखबर हो सकते हैं. सीधी-सी बात है. रोटी के लिए पैकेट वाला जो आटा हम रुपए देकर सीधे दुकान से ले आते हैं, वो गेहूं से तैयार होता है. इस वक्त देश के ज्यादातर राज्यों में गेहूं की फसल पककर तैयार खड़ी है, लेकिन कटाई में बाधा आ रही है. लॉकडाउन की वजह से कई जगह मजदूरों की भारी कमी है. कुछ जगहों पर हार्वेस्टर मशीनें नहीं पहुंच पा रही हैं. अगर गेहूं की फसल नहीं कटी, तो इसके खेतों में ही झड़ने की नौबत आ जाएगी. और क्या-क्या समस्याएं हैं, हमने किसानों से ये जानने के लिए कुछ कॉमन सवाल पूछे:

# क्या गेहूं या अन्य फसलों की कटाई में परेशानी हो रही है?

# मजदूरों या कटाई वाली मशीनों की कमी है क्या?

# क्या लॉकडाउन में मजदूरों के रेट बढ़ गए हैं?

# खेती में सोशल डिस्टेंसिंग का खयाल है?

# भविष्य को लेकर कोई आशंका?

इनमें से कुछ सवालों के जवाब हमें एक जैसे मिले, कुछ के जुदा-जुदा. कुछ खास मामलों पर ग़ौर करते हैं.

कटाई का रेट बढ़ गया

नाम: अनुपम. उम्र: 35 साल. जगह: बेगूसराय जिला, बिहार

अनुपम बताते हैं कि उनके खेतों में गेहूं की कटाई में इस बार समस्या हो रही है. हर साल कंबाइन हार्वेस्टर से कटाई होती थी, लेकिन इस बार ज्यादातर ‘पुली मशीन’ (छोटे हार्वेस्टर) से काम हो रहा है, वो भी रुक-रुककर. मशीन के जब-तब खराब होने पर उसकी मरम्मत नहीं हो पा रही है, क्योंकि उसके ज्यादातर पार्ट्स पंजाब-हरियाणा से ही लाए जाते हैं. एक दिक्कत ये भी है कि मशीनों से कटाई का रेट हर दिन बढ़ता जा रहा है. वे कहते हैं-

‘कल तक मशीन वाले कटाई के लिए 1200 रुपए/बीघा रेट ले रहे थे. आज अचानक इसे बढ़ा दिया. अब 1900 रुपए/बीघा मांग रहे हैं. कहते हैं कि लॉकडाउन की वजह से इस बार हर जगह रेट चढ़ा हुआ है.’

उन्होंने कंबाइन हार्वेस्टर और पुली मशीन के बीच कैपेसिटी का फर्क समझाया. बड़ी हार्वेस्टर मशीन एक घंटा के भीतर करीब तीन बीघा जमीन की उपज को काट देती है, जबकि पुली मशीन एक घंटा में एक बीघा ही कटाई कर पाती है. कंबाइन हार्वेस्टर का एक फायदा ये भी है कि इससे खेतों में बेमौसम बरसात की वजह से झुकी फसलें भी आसानी से कट जाती हैं.

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Indian Wheat Farmers
कंबाइन हार्वेस्टर से फसल की कटाई कम वक्त में हो जाती है. (फोटो: Reuters)

लॉकडाउन लंबा चला तो क्या होगा?

नाम: ललित चौधरी. उम्र: 37 साल. जगह: बहराइच जिला, यूपी

ललित चौधरी बताते हैं कि उनके खेतों में गेहूं की फसल लगी है, जो एक सप्ताह बाद कटने के लिए तैयार हो जाएगी. हार्वेस्टर मशीन की कोई समस्या नहीं है, ये पास के ही लखीमपुर खीरी से आ जाएगी. गेहूं कटाई का रेट है 1500-1600 रुपए/एकड़. वो लॉकडाउन के बीच प्रशासन के रुख को लेकर आशंकित नजर आते हैं. उन्होंने कहा-

‘बीते दिन हम अपने खेत से धनिया उठाने गए, तो प्रशासन ने लॉकडाउन की बात कहकर हमें रोक दिया. बाद में जब हमने एसडीएम से बात की, तो उन्होंने हमारी मदद की. बस अब इतना खयाल रखने को कहा है कि खेत में कम तादाद में मजदूर जाएं. वो भी खेत में फासला बनाकर काम करें. मन में एक आशंका है कि अगर निकट भविष्य में हालात नहीं सुधरे, तो हमारी उपज का क्या होगा?’

परंपरागत फसलों के अलावा वे मेंथा की खेती भी करते हैं, जिससे तेल निकाला जाता है. उनके खेत में मेंथा भी करीब 20 दिनों में कटने को तैयार होने वाला है.

कोरोना भाग जाए, फिर सब ठीक हो जाएगा

नाम: सुरेंदर सिंह. उम्र: 45 साल. जगह: जयपुर जिला, राजस्थान

सुरेंदर सिंह करीब 40 बीघा जमीन पर खेती करते हैं. 20 बीघे में जौ की कटाई चल रही है. बाकी के 20 बीघे में जो गेहूं की फसल है, वो 15 दिन बाद कटाई के लिए तैयार होगी. खेतों में मजदूर परंपरागत तरीके से, हाथों से ही कटाई कर रहे हैं. कटाई में कोई समस्या नहीं है. एक मजदूर 500 रुपए/दिन के हिसाब से मजदूरी लेता है. एक बीघा की उपज काटने में करीब 1000 रुपए का खर्च आएगा. वो कहते हैं कि पहले कोरोना वायरस भाग जाए, फिर सब ठीक हो जाएगा :

‘मजदूर अभी थोड़े डरे हुए हैं. हम खेतों पर साबुन-पानी का पूरा इंतजाम रखते हैं, जिससे संक्रमण न फैले. असल दिक्कत तब हो सकती है, जब हमारी फसल पूरी तरह कटकर तैयार होगी. हम उसे मार्केट कैसे ले जाएंगे? अगर मार्केट ले भी गए, तो अभी उसे खरीदने आएगा कौन?’

मतलब लॉकडाउन लंबा चला, तो परेशानी होना तय है. उन्होंने बताया कि जिन किसानों ने मार्केट या सेठ-साहूकारों से पैसे उधार ले रखे होंगे, उन्हें इस वक्त भारी दबाव महसूस हो रहा होगा.

Wheat Farmers India
कई जगहों पर परंपरागत तरीके से गेहूं की कटाई चल रही है (फोटो: Reuters )

किसानों पर दोहरी मार पड़ी है

नाम: सत्यदेव पांडेय. उम्र: 68 साल. जगह: भिंड जिला, मध्य प्रदेश

सत्यदेव पांडेय करीब पांच हेक्टेयर जमीन पर खेती करते हैं. बताते हैं कि लॉकडाउन के दौर में मजदूर मिलने में परेशानी हो रही है. वे एक और बड़ी समस्या की ओर ध्यान दिलाते हैं,

‘किसानों पर दोहरी मार पड़ी है. पहले बेमौसम बारिश और ओले की वजह से खेतों में खड़ी फसल को नुकसान पहुंचा. अब लॉकडाउन होने से मुसीबत बढ़ गई है. सरकार को हम किसानों की तकलीफ दूर करने की कोशिश करनी चाहिए.’

हाल ही में बेमौसम बारिश और ओले से नुकसान की समस्या उत्तर भारत के कई राज्यों में सामने आई है. इस वजह से खेतों में लगी गेहूं, मसूर, टमाटर जैसी उपज बर्बाद हुई है.

मुसीबत ने जीना सिखा दिया

नाम: अभय प्रसाद. उम्र: 43 साल. जगह: भागलपुर जिला, बिहार

अभय ने अपने गांव और आसपास के ब्लॉक में गेहूं की कटाई का जो तरीका बताया, वो सही मायने में इस मुसीबत के वक्त मिसाल की तरह है. उन्होंने कहा कि भागलपुर जिले के कई प्रखंडों में इन दिनों किसान ग्रुप बनाकर हाथों से गेहूं की कटाई कर रहे हैं. मतलब, मुसीबत के वक्त 8-10 किसान एकजुट होकर काम कर रहे हैं. वे कहते हैं,

‘ग्रुप के सभी लोग मिल-जुलकर पहले उस साथी किसान के खेत में जाकर गेहूं काटते हैं, जो जिसकी बाली ज्यादा पक गई हो. खेतों में कटाई का क्रम फसल देखकर तय होता है. अच्छा है, इस मुसीबत ने लोगों को दूर-दूर ही सही, पर मिल-जुलकर रहना तो सिखा ही दिया है.’

इस अच्छी बात के बीच अभय एक मुसीबत का जिक्र भी करते हैं. कहते हैं कि चैती छठ मनाई गई. अब रामनवमी सामने है. इन मौकों पर हर साल नौगछिया से केले की खूब सप्लाई होती थी. कोलकाता से लेकर दिल्ली की मंडी तक बड़ी मांग थी, लेकिन अबकी कोई खरीदार ही नहीं आ रहा. इस वजह से केला उपजाने वाले किसान मायूस हैं. जैसे वैशाली जिले में केला मतलब हाजीपुर, वैसे ही भागलपुर में केला मतलब नौगछिया.

समस्याएं बड़ी, पर कैसा है सरकारी इंतजाम?

ऐसा नहीं कहा जा सकता कि सरकार को खेती-किसानी की समस्याओं का अंदेशा नहीं था. लॉकडाउन पीरियड में केंद्र सरकार ने खेती से जुड़े काम-धंधे को लेकर कुछ रियायतों की घोषणा की थी. गृह मंत्रालय ने संबंधित विभागों को लेटर जारी करते हुए इन कामकाज को लॉकडाउन से छूट देने की बात कही थी-

 खेती के इंतजाम से जुड़ी एजेंसियों के कामकाज

– कृषि उत्पाद से जुड़ी मंडियां

– जमीन पर खेती का कामकाज

– खाद, बीज और कीटनाशकों के उत्पादन से जुड़ी इकाइयां

– कटाई और बुआई की मशीनों (जैसे कंबाइन हार्वेस्टर) की आवाजाही

Notification
गृह मंत्रालय का 27 मार्च का नोटिफिकेशन.

राज्य सरकारें भी अपने-अपने यहां किसानों के लिए नीतियां बनाने में जुटी हुई हैं. जैसे यूपी सरकार ने साफ किया है कि हार्वेस्टर मशीनों की आवाजाही के लिए डीएम के स्तर से पास बनवाना जरूरी होगा. गेहूं की कटाई और फसल की खरीद को लेकर भी जानकारी दी गई है.

सरकार के इन आश्वासनों के बीच किसानों की समस्याएं और चिंताएं अपनी जगह बरकरार हैं. लॉकडाउन कब तक चलता है, बहुत-कुछ इस पर भी निर्भर करता है.

चलते-चलते, ये फॉमूला याद रखना

अब कुछ ‘जरा हटके’ टाइप बात हो जाए. खेती-किसानी की चर्चा में कुछ जगहों के लोग खेत को बीघे में बताते हैं, कुछ एकड़ में, कुछ हेक्टेयर में. लेकिन जब आप ये पूछेंगे कि एक एकड़ में कितने बीघे, तो इसका अलग-अलग जवाब मिलता है. वजह ये है कि बीघा जमीन मापने की कोई मानक इकाई नहीं है. बीघा बनता है कट्ठे से. इस कट्ठे के साइज में अलग-अलग जगहों पर बड़ा अंतर पाया जाता है. मतलब ये वर्ग फुट या वर्ग मीटर जैसा मानक नहीं है. हम बीघे के थोड़ी और तह में गए, तो बड़े-बुजुर्गों से ये जानकारी हासिल हुई:

20 फुरकी = 1 धुरकी

20 धुरकी= 1 धूर

20 धूर = 1 कट्ठा

20 कट्ठा = 1 बीघा

वैसे ये जानकारी अब तक गूगल बाबा के पास नहीं है. एकड़ और हेक्टेयर के बारे में जानकारी लेने के लिए आप आसानी से गुगलिया सकते हैं.