23 मार्च आज है क्रांति का सबसे बड़ा दिन

आज क्रांति का सबसे बड़ा दिन है. चार गुनी क्रांति का दिन. क्योंकि 23 मार्च को ही शहीद दिवस होता है. आज के दिन ही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई थी. 23 मार्च ही वो दिन था, जब इंकलाबी पंजाबी कवि अवतार सिंह संधू उर्फ ‘पाश’ को खालिस्तानी उग्रवादियों ने गोली मार दी थी. और यही वो दिन है, जब राममनोहर लोहिया का जन्म हुआ था. आज इस मौके पर इनके बारे में ढेर सा पढ़िए. जो हम खास आज के दिन के लिए आपके लिए लेकर आए हैं. इस आर्टिकल के जरिये वो सारे किस्से, सारी बातें और सारे वीडियोज आप तक पहुंचाने की कोशिश है.

भगत सिंह का जिक्र सब करते हैं. तमाम पंथों वाले. अपने हिसाब से. किसी को विचार दिखते हैं, कोई उनके हाथ में बंदूक बस देख पाता है. धर्म के नाम पर भरे बैठे भी भगत सिंह को अपना आदर्श बताते हैं. ये जाने बिना कि वो हाथ में बंदूक लेने के अलावा भी बहुत कुछ कह गए हैं. ये जाने बिना कि वो नास्तिक थे. नास्तिक आपके धर्म के खिलाफ नहीं होते. नास्तिकता क्या है. आप यहां से जान सकते हैं. ये एक प्रतिनिधि पत्र है, जिससे आपको नास्तिकता का मोटा-मोटी हिसाब लग जाता है.

जैसे ये हिस्सा जिसमें वो लिखते हैं “मैं यह समझने में पूरी तरह से असफल रहा हूं कि अनुचित गर्व या वृथाभिमान किस तरह किसी व्यक्ति के ईश्वर में विश्वास करने के रास्ते में रोड़ा बन सकता है? किसी वास्तव में महान व्यक्ति की महानता को मैं मान्यता न दूं, यह तभी हो सकता है, जब मुझे भी थोड़ा ऐसा यश प्राप्त हो गया हो जिसके या तो मैं योग्य नहीं हूं या मेरे अन्दर वे गुण नहीं हैं, जो इसके लिये आवश्यक हैं. यहां तक तो समझ में आता है. लेकिन यह कैसे हो सकता है कि एक व्यक्ति, जो ईश्वर में विश्वास रखता हो, सहसा अपने व्यक्तिगत अहंकार के कारण उसमें विश्वास करना बन्द कर दे? दो ही रास्ते सम्भव हैं. या तो मनुष्य अपने को ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी समझने लगे या वह स्वयं को ही ईश्वर मानना शुरू कर दे.”

मैं नास्तिक क्यों हूं

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भगत सिंह खुद के लिए क्या सोचते थे? याद रहे कि कुछ समय पहले उन्हें आतंकी कहने पर बहुत बवाल हुआ था लेकिन इस विषय में खुद भगत सिंह का जो मानना था. उसे पढ़े बिना कोई राय नहीं बनानी चाहिए.   भगत सिंह खुद को क्या मानते थे, क्रांतिकारी या आतंकवादी? जानने के लिए आप ये पढ़ें.

शहीद भगत सिंह बम फेंककर क्रांतिकारी नहीं बने. अपने विचारों से बने. उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खासियत उनके विचार हैं. 23 की उम्र में वह जो कुछ लिख गए, वह उन्हें आजादी के दूसरे सिपाहियों से बिल्कुल अलग खड़ा करता है.

उन्हें सलाम करते हुए हम उनके कुछ मशहूर कोट्स यहां पेश कर रहे हैं. वह किस किस्म की दुनिया बनाना चाहते थे, आप उनकी कही इन बातों से समझ सकते हैं: भगत सिंह के 20 क्रांतिकारी विचार

वैसे भगत सिंह के साथ आपने ये गाना तो कभी न कभी सुना ही होगा.

तू धरती की मांग संवारे सोए खेत जगाए
सारे जग का पेट भरे तू अन्नदाता कहलाए
फिर क्यो भूख तुझे खाती है और तू भूख को खाए
लुट गया माल तेरा लुट गया माल ओए
पगड़ी संभाल जट्टा.

लेकिन यही गाना क्यों? ये जानना चाहें तो इधर आएं. क्या है पगड़ी संभाल जट्टा के पीछे की कहानी?

कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि भगत सिंह को फांसी असेंबली पर बम फेंकने की वजह से हुई. पर ऐसा नहीं है. असेंबली में बम फेंकने के बाद बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह के पकड़े जाने के बाद क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी का दौर शुरू हुआ. राजगुरु को पुणे से अरेस्ट किया गया. सुखदेव भी अप्रैल महीने में ही लाहौर से गिरफ्तार कर लिए गए. भगत सिंह को पूरी तरह फंसाने के लिए अंग्रजी सरकार ने पुराने केस खंगालने शुरू कर दिए.

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फिर ये सब उन्हें फांसी देने तक कैसे जा पहुंचा. जानने के लिए ये पढ़ें. ये थी भगत सिंह को फांसी की असली वजह

उसकी शहादत के बाद बाक़ी लोग
किसी दृश्य की तरह बचे
ताज़ा मुंदी पलकें देश में सिमटती जा रही झांकी की
देश सारा बच रहा बाक़ी

उसके चले जाने के बाद
उसकी शहादत के बाद
अपने भीतर खुलती खिड़की में
लोगों की आवाज़ें जम गयीं

उसकी शहादत के बाद
देश की सबसे बड़ी पार्टी के लोगों ने
अपने चेहरे से आंसू नहीं, नाक पोंछी
गला साफ़ कर बोलने की
बोलते ही जाने की मशक की

उससे सम्बन्धित अपनी उस शहादत के बाद
लोगों के घरों में, उनके तकियों में छिपे हुए
कपड़े की महक की तरह बिखर गया

शहीद होने की घड़ी में वह अकेला था ईश्वर की तरह
लेकिन ईश्वर की तरह वह निस्तेज न था

भगत सिंह पर ये कविता लिखी थी पाश ने. पाश और भगत सिंह में एक चीज साझी है. दोनों को 23 मार्च के दिन मार दिया गया. उनकी ये कविता देखें.

भगत सिंह पर कब्जा जमा रखा है पॉलिटिकल पार्टियों ने. दक्षिणपंथी हो चाहे वामपंथी. भगत सिंह इसीलिए हमेशा लाइमलाइट में रहे. लेकिन बाकी दो क्रांतिकारियों की उतनी बात नहीं होती. कोई बात नहीं. सबको अपना अपना हीरो चुनने का हक है. इससे उनके बलिदान की कीमत कम नहीं होती.

खैर पॉलिटिक्स जाए किसी और का घर बसाए. हमको अपने शहीदों को याद करेंगे. अपने तरीके से. आपको भी याद करवाएंगे. उनके बारे में आपका ज्ञान जांचेंगे. अगर तैयार हो तो आ जाओ. सुखदेव,राजगुरु और भगत सिंह पर नाज़ तो है लेकिन ज्ञान कितना है?

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वैसे आज जन्मदिन भी है. राम मनोहर लोहिया का. लोहिया जो कहते थे, सत्ता को चुनौती देनी है तो सबसे पहले उसकी जड़ों में मट्ठा डालना चाहिए. आपको बताते हैं वो किस्सा जब जवाहरलाल नेहरू खुद पर किए जाने वाले सरकारी खर्चों पर सफाई देते वक्त घिर गए. जब उन्हें लोहिया की बात पकड़ने पर मुंह की खानी पड़ी थी.