डॉक्टरों के मुताबिक कोविड के 5 प्रतिशत मरीज ठीक होने के बाद फिर से अस्पताल आते हैं, अमित शाह का मामला अकेला नहीं

 डॉक्टरों के मुताबिक कोविड के 5 प्रतिशत मरीज ठीक होने के बाद फिर से अस्पताल आते हैं, अमित शाह का मामला अकेला नहीं

गृह मंत्री अमित शाह | फोटो: एएनआई

दिल्ली के डॉक्टरों का कहना है कि ठीक हो चुके कुछ मरीजों में पोस्ट-कोविड सिम्पटम फेफड़ों को पहुंची क्षति या ‘पल्मोनरी फाइब्रोसिस’ का नतीजा हो सकते हैं.

नई दिल्ली: तीन दिन पहले कोविड-19 से उबरे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह मंगलवार को फिर थकावट और शरीर में दर्द की परेशानी के साथ अस्पताल लौटे, लेकिन इसका सामना करने वाले वह अकेले नहीं हैं.

दिल्ली के डॉक्टरों ने दिप्रिंट को बताया कि कोविड-19 को मात दे चुके करीब 5 फीसदी मरीज बुखार, थकान और सांस की तकलीफ के साथ फिर अस्पताल पहुंच रहे हैं.

नोएडा स्थित मैक्स हेल्थकेयर में प्रिंसिपल कंसल्टेंट पल्मोनॉलॉजी डॉ. शरद जोशी ने कहा, ‘हमारे पास ऐसे मरीजों की खासी तादात है जो कोविड-19 से जुड़ी जटिलताओं से जूझ रहे हैं. इसमें लंबे समय तक रहने वाला हल्का बुखार, जो कई बार दो से तीन हफ्ते तक आता रहता है, सांस की तकलीफ, शरीर में दर्द, जोड़ों में दर्द, महीनों तक बना रहने वाला मांसपेशियों का दर्द, भूख घटना, भोजन का स्वाद महसूस न होना आदि शामिल है.’

उन्होंने बताया, ‘ऐसे मरीजों, जिन्हें कोविड टेस्ट निगेटिव रहने के बाद छुट्टी दे दी गई, में से करीब 5 फीसदी इसी तरह की जटिलताएं सामने आने पर फिर से अस्पताल पहुंचे हैं.’

फोर्टिस अस्पताल, शालीमार बाग के निदेशक और पल्मोनोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. विकास मौर्य ने कहा, ‘अस्पतालों में लौटने वाले अधिकांश मरीज ऐसे हैं जो पूर्व में वायरल बीमारी से गंभीर तौर पर प्रभावित हुए थे.’

ऐसे मरीजों, जिन्हें कोविड इलाज के दौरान आईसीयू में रहना पड़ा था, का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि 40 फीसदी में एक बार ठीक होने के बाद भी ‘सांस लेने में दिक्कत, खांसी और थकावट की समस्या’ आई.

READ  Basti News: वीडियो कॉल से ले रहे कोरोना पीड़ितों का हाल-चाल

हालांकि, सरकारी अस्पताल के एक डॉक्टर ने कहा, ‘इस पर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगा.’ उन्होंने आगे कहा, ‘यह मानसून का मौसम भी है इसमें इस तरह की शिकायतें अमूमन आती ही हैं.’

फेफड़े को क्षति पहुंचना एक फैक्टर

कोविड से ठीक हो जाने के बाद भी मरीजों के बीमार पड़ने के दावों की वैज्ञानिक अध्ययनों के जरिये भी पता लगाने की कोशिश की गई है.

इस माह के शुरू में चीनी मीडिया ने बताया था कि वुहान, जहां पिछले साल कोविड-19 महामारी की शुरुआत हुई थी, में ठीक हो चुके 100 मरीजों पर किए गए अध्ययन में पता चला है कि 90 फीसदी लोगों में फेफड़ों की क्षति बाद में भी जारी थी.

जुलाई में प्रतिष्ठित जेएएमए में प्रकाशित एक इतालवी अध्ययन, जिसमें पहला लक्षण दिखने के दो महीने बाद ठीक हुए 143 मरीजों को शामिल किया गया था, के मुताबिक 85 प्रतिशत लोगों से कम से कम लक्षण पाया गया. सबसे ज्यादा लोगों ने थकावट और सांस लेने में दिक्कत की शिकायत की.

इस रिपोर्ट के लिए संपर्क करने पर दिल्ली के डॉक्टरों ने दिप्रिंट को बताया पोस्ट-कोविड सिम्पटम फेफड़ों को पहुंची क्षति या ‘पल्मोनरी फाइब्रोसिस’ का नतीजा हो सकते हैं.

दिल्ली स्थित श्री गंगा राम अस्पताल में एमेरिट्स कंसल्टेंट डॉ. एस.पी. बायोत्रा ने कहा, ‘जिन मरीजों को (इलाज के दौरान) सीने में समस्या का सामना करना पड़ा था, उनमें से ज्यादातर को पोस्ट-कोविड फाइब्रोसिस हो सकता है, जो फेफड़ों की क्षमता घटा देता है और मरीज को सांस लेने में तकलीफ होती है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘मरीजों ने मोटे तौर पर दो तरह की समस्याओं के बारे में ही शिकायत की है, एक हल्का बुखार रहना और सांस फूलना या छाती में जकड़न. समय के साथ बुखार ठीक हो जाता है और यह कोई समस्या नहीं है. हालांकि, सीने में समस्या के लिए अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत पड़ती है और लंबे समय में यह फेफड़ों की स्थायी क्षति में बदल सकती है.’

READ  Basti Coronavirus Update: विदेश से आए नागरिकों के स्वास्थ्य का प्रतिदिन होगी निगरानी

एम्स के पल्मोनरी मेडिसिन और स्लीप डिसऑर्डर डिपार्टमेंट के पूर्व प्रमुख डॉ. जी.सी. खिलनानी ने बताया, ‘फेफड़े में फाइब्रोसिस की समस्या से जूझ रहे ज्यादातर मरीज वे हैं जिनके दोनों फेफड़े कोविड का इलाज कराने के दौरान निमोनिया से प्रभावित हो गए थे.’

खिलनानी ने साथ ही बताया, ‘इनमें से कुछ लक्षण ठीक हो जाने वाले हैं और मरीजों को स्वास्थ्य लाभ और श्वसन संबंधी व्यायाम करने की जरूरत होती है. हालांकि, कुछ मामलों में लंग फाइब्रोसिस होने पर मरीजों को स्थायी क्षति का सामना करना पड़ सकता है.’

पल्मोनरी फाइब्रोसिस के इलाज के बारे में पूछे जाने पर डॉ. जोशी ने कहा, ‘फेफड़ों की क्षति, कोविड-19 और फाइब्रोसिस के लिए अलग-अलग इलाज होता है. तो हम कुछ स्टेरॉयड की हाई डोज और एंटी-फाइब्रोसिस ड्रग के साथ उपचार शुरू करते हैं.’

उन्होंने कहा, ‘दुर्भाग्य से रक्त या शरीर में कोई ऐसा संकेतक या बायोलॉजिकल मार्कर नहीं होता है जो अनुमान लगा सके कि किसी मरीज विशेष को पल्मोनरी फाइब्रोसिस और पुरानी बीमारी होगी. अगर हम किसी तरह से इसका पता लगाने में सक्षम हो सकें तो शायद उपचारात्मक कदम उठा सकते हैं. यह एक सबसे बड़ी समस्या है.’