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Monday, September 20, 2021

“10 से 5 फोन किया करो, फोन पर कुछ नही होता”- बस्ती जिले के सोनहा थानाध्यक्ष

भारत

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Kuldeep Kumar Chaudhary
Reporter Basti Khabar Team
पुलिस स्टेशन सोनहा-बस्ती / फाइल फोटो - @SonhaThana
पुलिस स्टेशन सोनहा-बस्ती / फाइल फोटो – @SonhaThana

सोनहा थाना क्षेत्र के एक गांव में विवाद की सूचना देने वाले पत्रकार पर ही बिगड़ पड़े दरोगा, जेल भेजने की दी धमकी। साथ ही सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक के बीच ही फोन करने की दे डाली नसीहत।

बस्ती। जिले में सोनहा थाने के इंस्पेक्टर राम कृष्ण मिश्रा का ऐसा बयान सामने आया है जो सीधे पुलिस महकमे पर सवाल खड़ा कर सकता है। शनिवार की रात लगभग 8.00 बजे स्थानीय पत्रकार धर्मेन्द्र कुमार भट्ट ने उन्हे फोन पर जानकारी दी कि थाना क्षेत्र के नवगढ़वा गांव में अनिल कनौजिया के घर पर गांव के दबंग गाली और मारने-पीटने की धमकियां दे रहे हैं। उस समय घर की महिलाओं द्वारा 112 पर काल किया गया लेकिन नम्बर नही मिला तो विवश होकर महिलाओं ने पत्रकार धर्मेन्द्र को फोन कर मदद मांगी।

उक्त मामले की सूचना देने के लिए जब पत्रकार धर्मेन्द्र ने थानाध्यक्ष सोनहा राम कृष्ण मिश्रा को फोन किया तो दरोगा जी ने न समस्या को सुना और न समझा, उल्टे पत्रकार को ही नसीहत देने लगे कि; फोन पर कोई काम नही होता मिलना पड़ता है, सामने बैठकर बातचीत होती है। उस समय रात के 8.00 बजे रहे थे लेकिन उन्होने कहा मैं रात के 10 बजे क्या मदद कर सकता हूं। इतना ही नही पत्रकार पर धौंस जमाते हुये दरोगा ने कहा कि 10 से 5.00 बजे के बीच बात किया करो, और सूचना गलत हुई तो तुमको जेल भेजूंगा।

बातचीत के दौरान थानाध्यक्ष यह बार-बार कह रहे थे कि सूचना अगर गलत हुई तो तुम्हें जेल भेज दूंगा।

इस मामले को लेकर थानाध्यक्ष का बयान इस तरह आने के बाद पत्रकार ने क्षेत्राधिकारी को भी फोन किया और पूरे मामले से अवगत कराया। क्षेत्राधिकारी ने भी यह स्वीकार किया कि इस तरह का बयान उम्मीद से परे है। फिलहाल उन्होने पत्रकार से मामले को अपने स्तर से देखने की बात कही।

इस मामले पर थानाध्यक्ष का पक्ष जानने के लिए बस्ती खबर द्वारा संपर्क किया गया तो उन्होने कहा कि, “हम लोग भी इंसान हैं, जानवर नही। हमारा किसी भी मिडियाकर्मी से कोई व्यक्तिगत शत्रुता नही है, पहले आप हमारे बारे में किसी से पता कर लीजिए”। इसके अलावा थानाध्यक्ष ने 10 से 5 के बीच ही फोन करने के बयान पर कोई भी सीधा जवाब नही दिया।

अब यह बड़ा सवाल खड़ा होता है कि, अगर एक स्थानीय पत्रकार द्वारा अपने ही स्थानीय पुलिस को किसी वाद-विवाद की सूचना दी जाए तो उस सूचना पर गंभीर होने और पत्रकार को घटनाओं की सूचना देने के लिए आभार व्यक्त करने के बजाए उक्त सूचना को संदेहास्पद मानकर उल्टे जेल भेजने की धमकी देना कहां तक सही है? इस तरह तो समाचार पत्रों, टीवी, समाचार पोर्टल्स आदि पर पत्रकारों द्वारा दी जा रही सूचनाएं भी इन थानाध्यक्ष के लिए शक के दायरे में ही होंगी, फिर ये जनता के साथ निष्पक्ष कैसे हो पाते होंगे?

आपको बता दें कि पीड़ित पक्ष अनिल कनौजिया को पुलिस पहले ही थाने पर उठा ले गयी थी। जिससे दबंगों से परेशान परिजनों ने पत्रकार से फोन करके मदद मांग था। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ऐसे पुलिसकर्मी अपने विभाग की छबि कितनी सुधार सकते हैं, और जनता को कितनी सुरक्षा दे सकते हैं।

उत्तर प्रदेश पुलिस ‘पुलिस छवि सुधार मुहिम’ चला रही है, जिले के पुलिस कप्तान चाहे जितनी कोशिशें कर लें लेकिन महकमे के ऐसे ही गिने चुने इंसपेक्टर महकमे की छबि सुधारने में बाधा बन रहे हैं। यही कारण है कि पुलिस और पब्लिक के बीच जो समन्वय होना चाहिये नही बन पाया। नतीजा ये है कि न अपराध कम हुये और न अपराधी।

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