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बजट 2020: LIC में हिस्सेदारी बेचेगी सरकार, जानिए आपके पैसों का क्या होगा?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मोदी सरकार 2.0 का दूसरा बजट पेश किया. 1 फरवरी, 2020 को. वित्त मंत्री ने ऐलान किया कि सरकार LIC यानी लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन में अपनी हिस्सेदारी बेचेगी. वित्त मंत्री ने ऐलान किया कि IPO के जरिए सरकार अपनी हिस्सेदारी बेचेगी. हालांकि वित्तमंत्री ने इसके बारे में डिटेल में जानकारी नहीं दी. वित्तमंत्री की इस घोषणा के दौरान विपक्ष ने इसका विरोध किया.

लेकिन ऐसा क्यों है कि सरकार LIC में अपनी हिस्सेदारी बेचने जा रही है? LIC में सरकार की 100 फीसदी हिस्सेदारी है. सरकार अपनी कुछ हिस्सेदारी बेचकर पैसा जुटाना चाहती है. वित्त मंत्री ने कहा कि वो IPO (इनिशियल पब्लिक ऑफर ) के जरिए अपनी हिस्सेदारी बेचेगी. लेकिन LIC शेयर मार्केट में लिस्टेड नहीं है. यानी इसके लिए LIC को पहले शेयर मार्केट में लिस्टेड होना होगा. अगर यह शेयर मार्केट में लिस्टेड होती है तो यह मार्केट वैल्युएशन के मामले में देश की टॉप लिस्टेड कंपनी होगी. सरकार एक-एक कर सरकारी कंपिनयों में अपनी हिस्सेदारी बेच रही है. इससे पहले मोदी सरकार IRCTC का IPO लेकर आ चुकी है. इसे लोगों ने हाथों हाथ लिया था. सरकार LIC के साथ भी IRCTC जैसा करने जा रही है. यानी IPO लाएगी और अपनी हिस्सेदारी बेचेगी.

हालांकि ये भी सच है कि LIC में सब कुछ ठीक नहीं है. उसकी माली हालत ख़राब है. क्योंकि बैंकों की तरह LIC के नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) काफी बढ़ गए हैं. आसान भाषा में कहें तो लोग लोन लेकर चुका नहीं रहे हैं, जिससे बोझ बढ़ गया है. 30 सितंबर, 2019 तक LIC का NPA 30 हज़ार करोड़ रुपए हो गया है. LIC की कोशिश रहती है कि वो NPA को डेढ़ से दो फीसद के बीच रखे. लेकिन 2019-20 की दूसरी छमाही में ये आंकड़ा 6.1% पहुंच गया. इस चक्कर में LIC की हालत यस बैंक, एक्सिस बैंक और ICICI बैंक जैसी हो गई, जो ज़्यादा NPA से जूझ रहे हैं.

LIC की इस हालत का ज़िम्मेदार कौन है?

डेक्कन क्रॉनिकल, एस्सार पोर्ट, आलोक इंडस्ट्रीज, एबीजी शिपयार्ड, यूनिटेक, जीवीके पॉवर और जीटीएल जैसी कई कंपनियां हैं, जो डिफॉल्टर हैं. अनिल अंबानी की रिलायंस और DHFL को दिया गया भारी-भरकम लोन भी NPA का कारण माना जा रहा है.

LIC ने इन्हें पैसा क्यों दिया?

क्योंकि एलआईसी कॉरपोरेट को टर्म लोन और नॉन कनवर्टिबल डिबेंचर्स के ज़रिए कर्ज़ देती है. इससे LIC को मोटा ब्याज मिलता है. लेकिन अब ऐसे हालात हैं कि ज़्यादातर मामलों में LIC को ज़्यादा कुछ मिलने की उम्मीद भी नहीं है.

LIC के साथ और क्या ग़लत हुआ?

LIC का काम वैसे तो अच्छा चल रहा था, 29 करोड़ पॉलिसियां थी उसके पास. 31 लाख करोड़ की प्रॉपर्टी थी. लेकिन वित्त वर्ष 2019-20 की दूसरी तिमाही के दौरान LIC के कुल एसेट्स में 57 हज़ार करोड़ की कमी आई. जून में ख़त्म हुई तिमाही में LIC का शेयर पोर्टफोलियो मतलब बाज़ार में हुए निवेश का मूल्य 5.43 लाख करोड़ था. जो घटकर 4.86 लाख करोड़ रह गया.

घाटा क्यों हुआ?

LIC ने जिन बड़ी कंपनियों में निवेश किया है, वो घाटा झेल रही हैं. रही-सही कसर IDBI जैसे NPA में दबे बैंकों ने निकाल दी. हुआ ये कि LIC ने 21 हज़ार करोड़ रुपये का निवेश करके IDBI में 51 फीसदी हिस्सेदारी ख़रीदी थी. IDBI की हालत तो नहीं सुधरी LIC की बिगड़ गई. जून 2019 में ख़त्म हुई पहली तिमाही में IDBI को 3800 करोड़ का घाटा हुआ.

IDBI से इतर LIC ने SBI, PNB, इलाहाबाद बैंक और कॉरपोरेशन बैंक में भी हिस्सेदारी बढ़ाई है. ये सभी सरकारी क्षेत्र के बैंक हैं. सरकारी बैंक की ख़स्ताहालत किसी से छुपी नहीं है. सरकार भी मानती है कि NPA के कारण बैंकिंग सेक्टर चुनौतियों का सामना कर रहा है. इसका असर LIC पर भी पड़ रहा है.

LIC को लेकर एक तरह से सरकार का भरोसा हिला हुआ है. क्योंकि LIC के साथ पिछले कुछ समय से कुछ भी ठीक नहीं हो रहा है. सरकार LIC का IPO लेकर आना चाहती है जिससे लोग इसके शेयर खरीदें. LIC एक भरोसे का नाम है. सरकार जानती है कि लोग इसका शेयर खरीदेंगे. तो पैसे आएंगे. हालांकि सरकार के इस फैसले से LIC पर लॉन्ग टर्म में क्या असर होगा. अभी कुछ नहीं कह सकते.

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