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बच्चे करना चाहते हैं मगर 'इनफर्टिलिटी' से जूझ रहे हैं, तो सरकार का ये कदम खुश कर देगा

बच्चे करना चाहते हैं मगर इनफर्टिलिटी से जूझ रहे हैं, तो सरकार का ये कदम खुश कर देगा
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यूनियन कैबिनेट ने बुधवार 19 फरवरी को असिस्टेड रीप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) बिल (ART बिल) मंजूर कर दिया. अब ये लोकसभा में पेश होगा, उसके बाद राज्य सभा में जाएगा. राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद ये कानून में तब्दील होगा.

क्या है ये बिल?

ये बिल गर्भाधान के आर्टिफिशियल तरीकों को लेकर नियम कानून सख्त रखने के लिए बनाया गया है. 2008 में इसे प्रपोज किया गया था. तब से लेकर अभी तक इसमें बदलाव किये जा रहे हैं. अब इसके आखिरी वर्जन को कैबिनेट ने मंजूरी दी है.

इस बिल का मतलब है गर्भ धारण करने में सहायता देने वाली तकनीक को रेगुलेट करने वाला बिल. यानी अगर आप बच्चा पैदा करना चाहते हैं, और प्राकृतिक तरीकों से नहीं कर पा रहे हैं. तो आप डॉक्टर से सलाह लेंगे. जांच करवाएंगे. फिर आपकी ज़रूरत के हिसाब से वो आपको कृत्रिम तरीके बताएंगे जिनसे आपको गर्भ धारण करने में मदद मिले.

इन्हीं तरीकों और तकनीकों का गलत इस्तेमाल न हो, और इस्तेमाल करने वालों के पास कानून का फ्रेमवर्क उपलब्ध रहे, इसलिए ये बिल लाया गया. ऐसा सरकार का कहना है. स्मृति ईरानी ने कैबिनेट की मंजूरी के बाद ये ट्वीट किए:

कैसे मिलती है गर्भाधान में सहायता?

# इन विट्रो फ़र्टिलाइजेशन (IVF) (यूटेरस से बाहर स्पर्म और एग्स को मिलाकर भ्रूण बनान और फिर यूट्रस में रखना)

# इंट्रा यूटेराइन इनसेमिनेशन (सीधे यूटेरस में स्पर्म पहुंचाना. इसमें पार्टनर का और डोनर का सप्रम, दोनों शामिल हैं)

# क्रायो प्रिजर्वेशन (स्पर्म्स और एग्स को फ्रीज करके रखना ताकि बाद में उनका इस्तेमाल हो सके)

इसमें सरोगेसी भी आती है.

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कई फर्टिलिटी क्लिनिक बिना रजिस्ट्रेशन के भी चल रहे हैं. उनके रेगुलेशन के लिए ये बिल लाया गया है. (सांकेतिक तस्वीर: रायटर्स)

इस बिल में क्या है ?

2008 में प्रपोज किए गए इस बिल में ये प्रावधान थे:

1. केंद्र सरकार National Advisory Board for Assisted Reproductive Technology नाम से एक बोर्ड बनाएगी. इसमें अधिकतम 21 सदस्य होंगे.

2. ये बोर्ड इस बात का ध्यान रखेगा कि ART दिलाने वाले क्लिनिक नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं. उनके स्टाफ का सिलेक्शन किस आधार पर हो रहा है. कौन कौन सी तकनीकें अपनाई जा रही हैं. ट्रेनिंग और रीसर्च को बढ़ावा मिल रहा है या नहीं. अगर नहीं, तो ये सुनिश्चित करना कि इस फील्ड में अधिक से अधिक काम हो.

3. भ्रूणों की रीसर्च में किस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, और ये तकनीक कानूनी रूप से कितनी सही है. इसमें कोई उल्लंघन तो नहीं हो रहा. इस बात का ध्यान भी ये बोर्ड रखेगा.

4. हर राज्य भी अपना एक ऐसा स्टेट बोर्ड बनाएगा.

5. जितने भी क्लिनिक्स ART के फील्ड में काम कर रहे हैं, उन्हें अपने आप को रजिस्टर कराना होगा.

6. वीर्य बैंक और मानव भ्रूण पर रीसर्च कर रहे क्लिनिक्स को भी खुद को रजिस्टर कराना ज़रूरी होगा.

7. जो भी रजिस्टर्ड क्लिनिक होंगे, ये उनकी ज़िम्मेदारी होगी कि किसी भी प्रोसीजर के बारे में पूरी जानकारी दें. जो लोग भी उनके पास प्रोसीजर के लिए आते हैं, उनको पूरी प्रक्रिया से जुड़े फायदे-नुकसान क्लिनिक बताएंगे. ये भी सुनिश्चित करेंगे कि डोनर स्पर्म्स या एग्स पूरी तरह से चेक कर लिए गए हैं या नहीं.

8. किसी भी ART क्लिनिक को कोई भी प्रोसीजर शुरू करने से पहले लिखित में अनुमति लेना आवश्यक होगा.

9. स्पर्म देने के लिए पुरुष की आयु 21 साल से 45 साल होगी, और एग्स देने के लिए महिला की उम्र 21 से 35 साल के बीच होगी. सभी डोनर्स की जांच की जायेगी कि उन्हें कोई बीमारी तो नहीं है.

10. एक डोनर का स्पर्म 75 बार से ज्यादा बार डोनेट नहीं किया जा सकता.

11. कोई भी महिला अपनी पूरी ज़िन्दगी में 6 बार से ज्यादा एग्स डोनेट नहीं कर सकती. दो डोनेशन्स के बीच कम से कम तीन महीनों का गैप होना ज़रूरी है.

12. सीमेन का एक सैम्पल एक बार में एक ही रेसिपिएंट को दिया जाएगा.

13. पूरे प्रोसीजर में डोनर का नाम और उसकी पहचान, प्रोसीजर कराने वाले पेशेंट्स का नाम और उनकी पहचान गुप्त रखी जाएगी.

14. जो भी इन नियमों का उल्लंघन करने का दोषी पाया जाता है, उसे पहली बार में तीन साल कि सज़ा और जुर्माना, और उसके बाद पांच साल की सज़ा और जुर्माना तक हो सकते हैं.

इसमें ये बात जोड़ी गई है कि एक नेशनल रजिस्ट्री एंड रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी नेशनल बोर्ड के साथ मिलकर काम करेगी. डेटाबेस बनेगा सभी क्लिनिक्स का, और उन पर नज़र रखी जाएगी.

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