28 C
Uttar Pradesh
Saturday, September 18, 2021

कोविड संकट: इलाज के अभाव में बेमौत मर रहे लोग और लाशें ढो रहीं नदियां

भारत

अप्रैल 2021 में दिल्ली के सुभाष नगर के श्मशान घाट पर शवों की क़तार. (फोटो: पीटीआई)
अप्रैल 2021 में दिल्ली के सुभाष नगर के श्मशान घाट पर शवों की क़तार. (फोटो: पीटीआई)

कोरोना संक्रमण मोदी सरकार की स्क्रिप्ट के हिसाब से नहीं आया था और इसीलिए इसका कोई तसल्लीबख़्श जवाब उसके पास नहीं है.

लोग हैं कि मरे जा रहे हैं, और वे अपने स्थानीय विधायक, सांसद, नेता, पन्ना प्रमुख, फलाने-ढिमकाने को फोन, संदेश, वॉट्सऐप पर गुहार लगा रहे हैं, जिनके मुनासिब जवाब किसी के पास नहीं हैं.

एक तरह की बेबसी और जिसे बायर्स रिमोर्स (ख़राब सौदा करने का पछतावा) उन लोगों में साफ दिखलाई दे रहा है, जो अभी तक नरेंद्र मोदी की तमाम नादानियों, नाकामियों, गलतियों और जनविरोधी क्रूरताओं को अनदेखा किए जा रहे थे. जो सबसे मजबूती से उनकी हर बात में मास्टरस्ट्रोक देख रहे थे.

चहक कम हो रही है. खीझ बढ़ रही है. यह पहली बार देखने में आया है कि जो लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के धुरंधर समर्थक थे, अब थोड़ा चुप हैं. उनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं जिन्हें ख़ुद प्रधानमंत्री भाव देते रहे हैं.

इनमें उनके बनारस लोकसभा चुनाव के प्रस्तावक और मशहूर गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र की बेटी शामिल हैं और आगरा के ये अमित जायसवाल जैन भी, जिसको मोदी जी ख़ुद ट्विटर पर फ़ॉलो करते हैं, जिसका दम गुहार लगाते निकल गया और उनके घर वालों नें उसकी कार से मोदी जी का चस्पां पोस्टर फाड़ डाला.

संतोष गंगवार जो मोदी कैबिनेट में हैं, उन्हें अपनी ही पार्टी की योगी आदित्यनाथ को चिट्ठी लिखकर वह सब रेखांकित करना पड़ा, जिसको लेकर बाक़ी जनता पर सख़्त क़ानूनी कार्रवाई की तलवार कभी भी गिर सकती थी.

अनुपम खेर जैसे मोदी समर्थक का ये कहना कि ज़िंदगी किसी एक के छवि-निर्माण से ज़्यादा महत्व रखती है, एक तरह से बदलती बयार की तरफ इशारा है. कुछ सुब्रमण्यम स्वामी की तरह हैं जो सरेआम और दिन दहाड़े सरकार को लानतें भेजने लगे हैं.

ये बात उसी यक्ष प्रश्न की तरह खड़ा है जो कनाडा के नागरिक अक्षय कुमार ने बहुत गहरी तहक़ीक़ात के बाद ढूंढ निकाली थी- आप आम को चूस के खाना पसंद करते हैं या काट के? ये सवाल मोदी के हर समर्थक के सामने हैं.

जनाधार चुनें या नेता जी को

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और समर्थकों को शायद समझ में आने लगा है कि वे मुश्किल दोराहे के क़रीब हैं, जहां उन्हें अंततः ये चुनना पड़ेगा कि देश या नरेंद्र मोदी. और ये सवाल उन्हें परेशान कर रहा है.

उन्हें समझ में आ रहा है कि जितना महत्व वे अपने नेतृत्व को देते रहे हैं, उससे उनका जनाधार दूर खिसकता जा रहा है. जब वे ख़ुद और उनके लोग मुश्किल में पड़ रहे हैं, तो सरकार और उसके मुखिया के पास कोई समाधान नहीं है.

जीटीबी अस्पताल में भर्ती होने का इंतज़ार करता एक कोविड संक्रमित शख़्स. (फोटो: रॉयटर्स)
जीटीबी अस्पताल में भर्ती होने का इंतज़ार करता एक कोविड संक्रमित शख़्स. (फोटो: रॉयटर्स)

इस वक़्त हर शख़्स के पास कोई न कोई दास्तान है मृत्यु की. ख़ासतौर पर हिंदू वोट बैंक वाले राज्यों में. उनमें से कुछ अभी भी हैं, जो विपक्ष पर आरोप या इधर-उधर की बातें कर रहे हैं. कुछ अब भी आंकड़ों पर कंबल डालने की कोशिश में लगे हैं.

ऐसे भी हैं जो टेस्ट कम करवा के, अस्पताल के आंकड़े झुठला के, ऑक्सीजन की कमी न मानकर और अंत्येष्टियों की संख्या छिपाकर चाहते हैं कि कोविड की बला टल जाएगी. गुजरात से लेकर उत्तर प्रदेश तक सरकार सिरे से झूठ बोलने पर आमादा हैं. और लाशें हैं कि उनके झूठों को रोज़ बेनक़ाब कर रही हैं.

भारतीय जनता पार्टी के सब तो नहीं, पर कुछ लोग तो ऐसा सोच रहे हैं कि उनका राजनीति में होने का क्या मतलब रह गया है. ख़ास तौर पर वे भी जिन्होंने असम या बंगाल में पार्टी की नींव मज़बूत करने में काफ़ी मेहनत की पर लीडरी उन लोगों को मिली, जो घुसपैठिये और दलबदलू थे.

क्या भूलें, क्या याद रखें

एक वर्ग ऐसा है जो मानता है कि 2024 आने में अभी वक़्त है और तब तक लोगों के आंसू सूख चुके होंगे और वे भूल जाएंगे कि उनके घर के लोग ज़िंदा होते अगर सरकार ने समय रहते कोरोना से निपटने के कदम उठाए होते.

हम अपने घर के लोगों, अपने दोस्तों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों के मरने को भूल जाएंगे, हम उस बदहवासी और बेबसी को भूल जाएंगे, जो एक सांस न ले पा रहा मुल्क महसूस कर रहा था. जब पूरी दुनिया भारत को भीड़ से बचने को कह रही थी, हिंदूवादी कुंभ की भी हांक लगाए थे, और चुनावी रैलियों में भी.

जब वैज्ञानिक लोग दूसरी लहर की चेतावनी दे रहे थे, हमारे नेता गण सुपरस्प्रेडर बने फिर रहे थे. हम उन 700 से ज़्यादा शिक्षाकर्मियों को भूल जाएंगे, जिन्हें ज़बरदस्ती उत्तर प्रदेश पंचायत की इलेक्शन ड्यूटी पर भेजा गया, और उन 800 से अधिक डॉक्टरों को भी, जो ख़राब व्यवस्था, काम के बोझ और तनाव के बीच कोरोना के शहीद हुए.

इस वर्ग की उम्मीद इस बात पर क़ायम है कि हम मोदी जी के बनाए शौचालय याद रखें पर गंगा में तैरती लाशों को भूल जाएं.

हम गोबर, गोमूत्र, रामदेव, कोरोनिल के चमत्कारों से अभिभूत होना बंद न करें और भूल जाएं कि जिस सरकार को अच्छे दिन के लिए वोट दिया था, वह आपसे सच, तथ्य, आंकड़े सब में हेराफेरी कर रही है. जैसे अदालत अनदेखा कर रही है, जैसे चुनाव आयोग ने किया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो साभार: पीआईबी)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो साभार: पीआईबी)

पेट्रोल सौ का होते ही मोदी जी की तस्वीर पंपों से पता नहीं क्यों हटवा ली गईं. रहने देते. जो वैक्सीन ठीक से नहीं बांट पा रहे, आख़िर उसके सर्टिफिकेट पर भी तो चेहरा उन्हीं का लगा है.

जिस वेंटिलेटर पर आपने अपने घर वालों को ठीक करने को भेजा था, वह पीएम केयर्स का था और बना ही ख़राब होने के लिए था. आपसे उम्मीद है कि आप भूल जाएं.

13 मई को जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से ये पूछा कि आबादी के कितने फ़ीसदी लोगों को पूरे टीके लग गए. जवाब मिला 22 लाख. जबकि 6 करोड़ से ज़्यादा टीके सरकार विदेशों में बांट आई.

कभी ये कहकर कि ये हमारी वैक्सीन मैत्री कूटनीति का हिस्सा था, और अब ये कह कि वह वाणिज्य करार का हिस्सा है. आप भूल जाएं. आप याद न रखें यह आंकड़ा. आप प्रधानमंत्री का वह प्रतापी चेहरा याद रखें जो आपके सर्टिफिकेट पर लगा है. वे न होते तो यह सब कैसे हो पाता. वही तो, वे होते, तो ये सब कैसे हो गया?

उनमें से कुछ को पता है कि वे सही नहीं हैं. लोग नहीं भूलते. और तब तो खासतौर पर नहीं, जब लोग ज़िंदा रह सकते थे. जब मृत्यु का शोक भी ठीक से नहीं किया जा सका है. न गले लग सके हैं, न ढाढ़स बंधा सके हैं.

उनके मन की एक बात ये भी है कि इस वक़्त चुप रहना और झूठ का साथ देना न सिर्फ़ ख़ुद के साथ, बल्कि मुल्क और उसके लोगों के साथ भी बेईमानी करना है.

एक ज़मीन है जो धीरे-धीरे खिसक रही है

मोदी समर्थक और भारतीय जनता पार्टी के लोगों को ऐसा इसलिए भी लग रहा है क्योंकि कुशासन की आंच से वे अभी तक बचे हुए थे. वे उन लोगों में शामिल नहीं थे, जिनकी नागरिकता पर सवाल कर वोटों की फसल काटी जानी थी.

वे उन लोगों में भी शामिल नहीं थे, जो संविधान और नागरिक अधिकारों की बात कर बिना किसी जांच या आरोप के जेल भेज दिए गए थे. वे उन लोगों में शामिल नहीं थे, जिन्हें देश के विश्वविद्यालयों में नौजवानों के पुलिसिया दमन से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था.

नोटबंदी और जीएसटी से जिन्हें बुरा तो लगा था, पर वे चुप लगा गए थे. बिना उन तमाम लोगों की तकलीफ़ देखे, जिनके समर्थन से उन्होंने चुनाव जीते थे. जिन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ा कि अर्थव्यवस्था का बंटाधार होने, रिकॉर्ड ग़रीबी और बेरोज़गारी बढ़ने से.

उनके लिए मंदिर काफ़ी था, सियासी तौर पर रोटियां सेंकने के. इतनी सारी लाशें बीच में आ जाएंगी किसने सोचा था. और हर लाश एक सवाल है. एक हस्तक्षेप है. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और प्रबंधन पर एक प्रमाणपत्र है.

मरने से पहले एक हलफिया एलान छूट गया है मोबाइल, वीडियो कॉल और वॉट्सऐप में. उस अटकी हुई सांस में, धीमी होती नब्ज में. वे ज़िंदा रहते. अगर समय रहते कदम उठाए गए होते.

अगर वैक्सीन पहले देश में इस्तेमाल की गई होती. ऑक्सीजन का इंतज़ाम वक़्त रहते कर लिया जाता. विदेशों से आई मदद कस्टम क्लीयरेंस में अटकाकर नहीं रखी होती. वैक्सीन और ऑक्सीजन को जीएसटी से माफ़ कर दिया जाता.

दुनिया और देश के विशेषज्ञ लोग जो कह रहे थे, उनकी समय रहते सुन ली जाती. विपक्ष को साथ लेकर चला जाता.

19 फरवरी 2021 को हुए कार्यक्रम में रामदेव और बालकृष्ण के साथ केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्ष वर्धन और नितिन गडकरी. (फोटो साभार: फेसबुक/@/AcharyBalkrishna)
19 फरवरी 2021 को हुए कार्यक्रम में रामदेव और बालकृष्ण के साथ केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्ष वर्धन और नितिन गडकरी. (फोटो साभार: फेसबुक/@/AcharyBalkrishna)

आख़िर ये मज़ाक़ कब तक चल सकता था, कि देश का स्वास्थ्य मंत्री किसी दिन एक नीम-हकीम के तथाकथित नुस्ख़े का मेडिकल रिप्रजेंटेटिव बना फिर रहा था और किसी और दिन डार्क चॉकलेट खाके कोरोना से लड़ने की हिमायत कर रहा था.

ऐसा कब ही हुआ होगा कि देश का इंडियन मेडिकल एसोसिएशन देश के स्वास्थ्य मंत्री (जो ख़ुद को एलोपेथी की डिग्री वाला बताते हैं) को बात-बात पर झाड़ता हुआ नज़र आए.

इतनी बड़ी भूल, चूक, गलती हो गई और उसका कोई ज़िम्मेदार ही तय नहीं किया गया. किसी से न इस्तीफ़ा लिया गया, न किसी की नौकरी गई. सिवा उन लोगों को तंग करने के, जो अनुपस्थित सरकार के कारण दूसरों की मदद करने की कोशिशें कर रहे थे.

हमारा मुख्यमंत्री झूठ बोल रहा है. हमारा विदेश मंत्री और हमारा स्वास्थ्य मंत्री, हमारा रेल मंत्री झूठ बोल रहा है. सब भूल जाएंगे हम.

उन्होंने कहा था, मैं बनारस आया नहीं हूं, मुझे गंगा मइया ने बुलाया है. उस गंगा मइया में लाशें हैं जो बही जा रही हैं. उनकी अपील है कि लोग भूल जाएं कि जब हिंदुस्तान पूरी दुनिया के सामने कटोरा लेकर खड़ा था, तब भारत में एक कोरोनाबाद में मोदी महल बहुत ज़रूरी काम की तरह खड़ा किया जा रहा था.

दुविधा में दोनों गए

इन लोगों की दुविधा बहुत जायज़ है. एक तो यही कि बहुसंख्य होने के बाद भी उन्हें ऑक्सीजन, वैक्सीन, अस्पताल में बिस्तर, दवाएं और श्मशान में जगह नहीं मिल पा रही है. दूसरा, ये कि जब इतनी हाय-हाय मची है, तो फिर सरकार हाथ पर हाथ धरे कैसी बैठी है.

तीसरा, सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है, तो उनका इस्तेमाल लीपापोती और झूठ बोलने के लिए क्यों किया जा रहा है? चौथा, जब ग़ैर भाजपाई लोगों की मदद करने आगे आ रहे हैं, तो उनकी पार्टी उनको निहित राजनीतिक स्वार्थों से प्रेरित क्यों बतलाए जा रही है. उन्हें कोस रही है.

पांचवा, ये कि सरकार के लोग बजाय दुनिया भर के विशेषज्ञों की सुनने की बजाय नीम-हकीमों को क्यों तरजीह दिए जा रही है.

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लॉकडाउन के बीच नए संसद के निर्माण का काम जारी है. (फोटो: पीटीआई)
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लॉकडाउन के बीच नए संसद के निर्माण का काम जारी है. (फोटो: पीटीआई)

छठा, ये कि जब लोग मर रहे हैं तब उन्हें इस बात के लिए तंग करना कि किसी के लिए ऑक्सीजन क्यों मांगी, या फिर श्मशान के फ़ोटो क्यों खींच लिए, या सेंट्रल विस्टा एक ज़रूरी काम है जो रुक नहीं सकता उस प्रवृत्ति को ही रेखांकित करती है, जो सरकार को अमानवीय, अलोकतांत्रिक, असंवेदनशील और क्रूर बनाती है.

इसमें एक और बात ख़ास है कि इनमें से बहुतों को चमत्कार, यंत्र-तंत्र-मंत्र, कुंडली, गाय, गोबर, गोमूत्र, कोरोनिल पर इतना यक़ीन है कि उन्हें लगता है उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. पर ऐसा सोचने वाले भी हिंदुस्तान में कितने लोग आए और कट लिए.

इतिहास से कुछ सीखने के लिए उसे थोड़ा पढ़ना पड़ता है और हम लोगों के लिए मिथक सच से ज़्यादा सच्चे और महत्वपूर्ण हैं. जैसे मोदी जी अपने जीवन में ही मिथक बन गए हैं. पर पीपीई पर अभी भी जीएसटी 18% है. वेंटिलेटर और ऑक्सीजन कॉन्सेंट्रेटर पर 12%.

माफ़ी वे मांगेंगे नहीं. गलती को मानेंगे नहीं. अकड़ वो छोड़ेंगे नहीं. दिल पर हाथ रखकर सच वे कहेंगे नहीं. भले ही भारत के लोगों को उसकी कितनी भी भयावह क़ीमत चुकानी पड़े. प्राइमटाइम के विदूषक सिस्टम को दोष देकर मोदी जी को बचाने की शानदार और बारीक कोशिश में लगे हैं. सिस्टम किसका है? कौन चला रहा है?

पार्टी के कई सारे लोग साफ़ कहेंगे तो नहीं, पर गुप्त तौर पर चाहते हैं कि किसी दिन तेजस्वी सूर्या की तरह साहेब को भी दो-चार सवालों का सामना करना पड़े, जो चाटने और काटने से ज़्यादा प्रासंगिक हों.

दिक्कत एक ही थी. कोरोना उनकी स्क्रिप्ट के हिसाब से नहीं आया था. और इसीलिए इसका कोई तसल्लीबख्श जवाब सरकार के पास नहीं है. जिंदा लोग इंतज़ार कर रहे हैं. उनकी चुप्पियां बोल रही हैं और पढ़ी जा रही हैं.

लाशें पूछ रही हैं इस देश का इंचार्ज कौन है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.) By- The Wire Hindi

- Advertisement -

सबसे अधिक पढ़ी गई

- Advertisement -

ताजा खबरें