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मध्य प्रदेश: क्यों गेस्ट लेक्चरर डेढ़ महीने से कमलनाथ सरकार के ख़िलाफ़ धरने पर बैठे हैं?

विशेष रिपोर्ट: मध्य प्रदेश के कॉलेजों में पढ़ाने वाले गेस्ट लेक्चरर भोपाल के शाहजहांनी पार्क में कांग्रेस सरकार की ‘वादाख़िलाफ़ी’ के विरोध में 10 दिसंबर 2019 से अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं.

‘अतिथि विद्वानों (गेस्ट लेक्चरर) को रोस्टर के अनुसार नियमित करने की नीति बनाएंगे. पीएससी में चयन न होने की स्थिति में उनको निकाला नहीं जाएगा. भविष्य के लिए अतिथि शिक्षकों का पैनल महाविद्यालय में अध्ययन किए विद्यार्थियों में से बनाया जाएगा.’

ये पंक्तियां मध्य प्रदेश में 2018 के विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस द्वारा जारी किए गए वचन-पत्र के 17.22 बिंदु में दर्ज हैं. लेकिन आज सरकार बनने के 13 माह बाद ये पंक्तियां ही प्रदेश की कांग्रेस सरकार के गले की हड्डी बन गई हैं.

प्रदेश के करीब 5000 गेस्ट लेक्चरर कांग्रेस सरकार के इस वचन को पूरा करवाने के लिए मोर्चा खोल दिया है. राज्य की राजधानी भोपाल के शाहजहांनी पार्क में वे टेंट और पंडाल के नीचे 10 दिसंबर 2019 से धरने पर बैठे हैं. कड़कड़ाती ठंड में महिला गेस्ट लेक्चचर भी अपने बच्चों के साथ धरनास्थल पर डटी हुई हैं.

शाहजहांनी पार्क में डटे इन गेस्ट लेक्चचर्स के चेहरे पर बस एक ही चिंता है कि कैसे अपना रोजगार बचाएं और कैसे अपना घर-परिवार चलाएं. उनकी यह चिंता इसलिए और अधिक बढ़ गई है क्योंकि उनका नियमितीकरण होना तो दूर, उल्टा पिछले दिनों से उन्हें सेवा समाप्ति के नोटिस मिलने लगे हैं.

आशीष पांडे की उम्र 43 वर्ष है. वे पिछले दस सालों से गेस्ट लेक्चचर के तौर पर विभिन्न कॉलेज में अध्यापन का कार्य करा रहे हैं.

वे बताते हैं, ‘मध्य प्रदेश में गेस्ट लेक्चचर्स द्वारा कॉलेज में अध्यापन कराने की व्यवस्था पिछले 25 सालों से चल रही है. यहां तक कि हमको पढ़ाने वाले भी गेस्ट लेक्चचर ही थे. इस व्यवस्था से जुड़े कई गेस्ट लेक्चचर्स की उम्र आज 50-55 साल हो गई है. इस उम्र में आदमी कहां जाएगा? राज्य सरकार ने यह सोचे बिना ही 2700 अतिथि विद्वानों को व्यवस्था से बाहर कर दिया. वे सभी नेट से पीएचडी योग्यताधारी हैं.’

वे आगे बताते हैं, ‘वचन-पत्र बनाते समय हमारे प्रतिनिधि दल से बैठक के दौरान स्वयं राहुल गांधी ने कहा था कि हमारी समस्या का समाधान करके हमारे नाम के आगे से ‘अतिथि’ हटाया जाएगा और हमारा नियमितीकरण करके हमें असिस्टेंट प्रोफेसर (सहायक प्राध्यापक) बनाएंगे. उन्होंने स्पष्ट कहा था कि आपका दशकों का अनुभव ही आपकी योग्यता है.’

आशीष के अनुसार, ‘राहुल गांधी, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने तब वचन-पत्र को गीता-कुरान मानते हुए कहा था कि आप हमारा 15 वर्षों का वनवास खत्म कीजिए, हम सत्ता में आएंगे तो 25 सालों का आपका वनवास खत्म करेंगे. हमने तो उनका वनवास खत्म कर दिया, लेकिन वे अपने वचन से मुकर गए हैं. पीएससी परीक्षा से चयनित उम्मीदवारों को हमारे पदों पर नियुक्त कर रहे हैं.’

ये गेस्ट लेक्चरर मुख्यमंत्री कमलनाथ और उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी से भी जाकर मिल चुके हैं. वहां उन्हें सिर्फ यह आश्वासन मिला कि किसी को बाहर नहीं निकाला जाएगा. इस आश्वासन से संबंधित एक ट्वीट मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री कार्यालय ने बीते दिसंबर महीने में किया था.

हालांकि इस आश्वासन के उलट हकीकत यह है कि पिछले कुछ समय में हजारों गेस्ट लेक्चरर्स को उनके कॉलेज द्वारा सेवा समाप्ति के पत्र मिलने शुरू हो गए हैं. ऐसे कई पत्रों की प्रति धरनारत अतिथि विद्वानों ने हमें उपलब्ध कराई हैं.

गौरतलब है कि इन पत्रों के पीछे मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (एमपीपीएससी) द्वारा सहायक प्राध्यापकों के चयन हेतु 2018 में आयोजित परीक्षा रही है. 3500 सहायक प्राध्यापकों के चयन हेतु उक्त परीक्षा 1992 के बाद प्रदेश में पहली बार हुई थी.

प्रदर्शनकारियों के अनुसार, इन ढाई दशकों के दौरान प्रदेश के शासकीय कॉलेजों में अध्यापन का कार्य उनके जिम्मे ही था. उस परीक्षा के चयनित आवेदकों को ही अब नियुक्ति मिलना शुरू हुआ है.

देवराज सिंह अतिथि विद्वान नियमितीकरण संघर्ष मोर्चा के संयोजक हैं. उन्हें भी सेवा समाप्ति का पत्र उनके कॉलेज द्वारा थमा दिया गया है. वे विदिशा जिले के गुलाबगंज शासकीय महाविद्यालय में नियुक्त थे. 47 वर्षीय देवराज 17 सालों से बतौर गेस्ट लेक्चरर अध्यापन कार्य करा रहे थे.

भोपाल में प्रदर्शन कर रहे इन शिक्षकों ने अपने ख़ून से हस्ताक्षर किया हुआ एक पत्र कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेजा था.

भोपाल में प्रदर्शन कर रहे इन शिक्षकों ने अपने ख़ून से हस्ताक्षर किया हुआ एक पत्र कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेजा था.

वे बताते हैं, ‘प्रदेश में सहायक प्राध्यापकों के कुल 5200 पद खाली थे. जिन पर गेस्ट लेक्चरर तैनात थे. यह व्यवस्था दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में ही ढाई दशक पहले शुरू हुई थी. उसके बाद राज्य सरकार ने कभी इन पदों को भरने के लिए परीक्षा नहीं कराई. लेकिन 2017 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने परीक्षा का आदेश जारी कर दिया.’

देवराज कहते हैं, ‘साल 2018 में परीक्षा हुई. परीक्षा को विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने तब ‘व्यापमं 2’ ठहराकर इसमें बड़ी गड़बड़ी और घोटाले के आरोप लगाए थे और सरकार में आने पर इसकी जांच की बात भी कही थी.’

वे आगे कहते हैं, ‘लेकिन आज उसी परीक्षा में चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी जा रही है. अब तक 5200 में से 2700 पद भरे जा चुके हैं. यानी कि 2700 गेस्ट लेक्चरर बेरोजगार हो गए हैं. जबकि इसी कांग्रेस ने चुनाव के पहले हमें नियमित करने की बात की थी, साथ ही यह भी कहा था कि यदि किसी अतिथि विद्वान का चयन पीएससी परीक्षा में नहीं होता तो भी उसे निकाला नहीं जाएगा.’

गौरतलब है कि पीएससी की परीक्षा में गेस्ट लेक्चरर्स को भी बैठने के लिए कहा गया था. जिसके चलते आयु सीमा में भी रियायत दी गई थी. लेकिन, गेस्ट लेक्चरर्स का कहना है कि उम्र की रियायत का लाभ हमें न मिलकर बाहर वाले आवेदकों (जो गेस्ट लेक्चरर नहीं थे) को मिल गया. उन्होंने भी आयु सीमा में बढ़ोतरी का लाभ उठाया जिससे हमारे लिए प्रतिस्पर्धा और कड़ी हो गई.

अनुपम सिंह बघेल शहडोल जिले के गवर्नमेंट आर्ट्स एंड कॉमर्स कॉलेज (ब्योहारी) में तैनात थीं. 16 दिसंबर 2019 को उन्हें भी कॉलेज की ओर से सेवा समाप्ति (फॉलेन आउट) का पत्र मिला है.

सात साल से अतिथि विद्वान के तौर पर सेवा दे रहीं अनुपम बताती हैं, ‘आयु सीमा में बढ़ोतरी हमारे लिए की गई थी लेकिन लाभ दूसरों ने उठाया. वहीं, परीक्षा में एक शर्त थी कि जिन आवेदकों के दो बच्चे होंगे, वे अयोग्य माने जाएंगे. लेकिन तीन बच्चों वाले कई अभ्यर्थियों का चयन कर लिया गया.’

इसी तरह 46 वर्षीय अनिल जैन 21 सालों से बतौर गेस्ट लेक्चरर सेवा दे रहे हैं. दमोह जिले के पथरिया शासकीय महाविद्यालय ने उन्हें भी सेवा समाप्ति का पत्र थमा दिया है.

अनिल बताते हैं, ‘एपीपीएससी के जरिये जिनकी भर्ती की गई है उनका इंटरव्यू तक नहीं किया गया. सबसे बड़ी विसंगति यही है कि उच्च शिक्षा जैसे संस्थानों में इंटरव्यू के बिना नियुक्ति हो रही हैं. जिससे कई ऐसे अयोग्य भी चयनित हो गए हैं जिनके पास पढ़ाने के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल तक नहीं है.’

उन्होंने बताया, ‘इतना ही नहीं भर्ती का विज्ञापन निकलने से लेकर नियुक्ति तक नियमों में बार-बार संशोधन किए गए. विज्ञापन में स्पष्ट लिखा होता है कि आवेदन की अंतिम तिथि तक आपके दस्तावेज पूरे होने चाहिए. लेकिन वेरिफिकेशन के बाद करीब 627 अभ्यर्थियों के पास पूरे दस्तावेज नहीं थे.’

वे आगे कहते हैं, ‘शासन ने इन्हें एक साल तक अवसर दिया कि दस्तावेज पूरे कर लें. जिन लोगों की पीएचडी, नेट नहीं थी, जो यूजीसी के नॉर्म्स पूरे नहीं करते थे, उन लोगों ने भी बाद में यह सब कर लिया और दस्तावेज फिर जमा कराए.’

अनिल बताते हैं, ‘एमपीपीएससी ने 2018-19 में 14 परीक्षाएं ली थीं, जिनमें से 9 परीक्षाओं के 143 उम्मीदवारों को इसलिए बाहर किया, क्योंकि अंतिम तिथि तक उनके दस्तावेज पूरे नहीं थे. उनके आवेदन निरस्त कर दिए गए. सहायक प्राध्यापक एकमात्र ऐसी परीक्षा है जहां नियुक्तियों के बाद भी दस्तावेज पूरे करने का समय दिया जा रहा है. ये उदारता समझ नहीं आती. भ्रष्टाचार की बू आती है.’

बता दें कि जून-जुलाई 2018 में संपन्न हुई एमपीपीएससी की उक्त परीक्षा के बाद भी अतिथि विद्वानों ने परीक्षा पर सवाल उठाए थे. उनके मुताबिक कांग्रेस ने भी तब उनका साथ दिया था. परीक्षा को घोटाला बताकर उनके साथ अन्याय की बात कही. और वोट लेने के लिए एमपीपीएससी पास न किए जाने की स्थिति में भी उन्हें न निकाले जाने की बात की थी. अब उसी परीक्षा के उम्मीदवारों के लिए जगह खाली करने के एवज में इन्हें निकाला जा रहा है.

भोपाल निवासी जय प्रकाश मेहरा 13 सालों से गेस्ट लेक्चरर हैं. विदिशा के गुलाबगंज शासकीय महाविद्यालय ने उनकी भी सेवा समाप्त कर दी है.

उनका कहना है, ‘एक तरफ सरकार की ओर से बार-बार कहा जा रहा है कि आप हमारे वचन-पत्र में शामिल हो, निकालेंगे नहीं. लेकिन दूसरी तरफ कल ही हमारे दो-तीन साथी और बाहर हो गए हैं.’

वे कहते हैं, ‘हमारे साथ समस्या ये है कि हम 40 की उम्र पार गए हैं. हमारे परिवार हैं. दशकों से परीक्षाएं कराईं नहीं और अचानक कराईं भी तो युवाओं के साथ हमारी प्रतिस्पर्धा करा दी. जो बच्चा आज की तारीख मे पढ़ कर निकलेगा. उससे हमें लड़ाया जाना कितना उचित है? हम पर बीबी-बच्चों, घर-परिवार का भी दबाव है, इसके चलते और उम्र के हिसाब से स्मरण शक्ति भी उतनी नहीं रही. क्या 50 साल के बूढ़े को 25 साल के पहलवान से लड़ाते हैं?’

अनुपम बघेल बताती हैं कि गेस्ट लेक्चरर्स को नवंबर माह तक उच्च शिक्षा मंत्री से न निकाले जाने और नियमितीकरण के संबंध में आश्वासन मिलता रहा लेकिन 26-27 नवंबर से अतिथि विद्वानों को सेवा समाप्ति संबंधी पत्र मिलने शुरू हो गए. तब जाकर सभी अतिथि विद्वानों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने की ठानी.

इसी कड़ी में बीते साल दो दिसंबर को गेस्ट लेक्चरर्स ने मुख्यमंत्री कमलनाथ के विधानसभा क्षेत्र छिंदवाड़ा से पद यात्रा निकालने का ऐलान किया.

देवराज सिंह बताते हैं, ‘छिंदवाड़ा में जब हम विरोध प्रदर्शन करने गये तो प्रशासन ने हमें प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी और कहा कि कमलनाथ जी के क्षेत्र में 40 सालों से जब से वे सांसद बने, कोई प्रदर्शन नहीं हुआ है. पुलिस ने हमें 24 घंटे छिंदवाड़ा में नजरबंद रखा और फिर गाड़ियों में भरकर पचमढ़ी के जंगलों में छोड़ दिया.’

उनका कहना है, ‘तब हमने पिपरिया में अपने आंदोलन को केंद्रित किया और वहां से भोपाल के लिए चार दिसंबर को पद यात्रा निकाली और दस दिसंबर को भोपाल पहुंचकर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए.’

आंदोलन कर रहे शिक्षकों ने ख़ुद को नियमित करने की मांग को लेकर पिपरिया से भोपाल की पदयात्रा भी की थी.

आंदोलन कर रहे शिक्षकों ने ख़ुद को नियमित करने की मांग को लेकर पिपरिया से भोपाल की पदयात्रा भी की थी.

इस तरह देखा जाए तो सरकार के खिलाफ गेस्ट लेक्चरर दो दिसंबर से प्रदर्शनरत हैं. साथ ही छिंदवाड़ा की घटना शासन और प्रशासन के अहंकार की भी बानगी है.

नरसिंहपुर के तेंदूखेड़ा शासकीय कॉलेज में तैनात रहीं विभा दुबे कहती हैं, ‘उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी बार-बार हमें यथावत रखने की बात कहते हैं, लेकिन कोई आदेश जारी क्यों नहीं करते? अगर उनकी रखने की मंशा है तो बस दो पंक्तियों का एक पत्र जारी करना है कि जो जहां काम करता था, वो वहीं रहेगा. लेकिन पता नहीं कि वो 50 दिनों से क्या कर रहे हैं.’

गेस्ट लेक्चरर्स के साथ सरकार की इस वादाखिलाफी को लेकर जब हमने उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी से संपर्क करने का प्रयास किया तो उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला.

इस संबंध में प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता रवि सक्सेना कहते हैं, ‘जो अतिथि विद्वान यूजीसी की योग्यताएं पूरा करते हैं, उनके लिए हमने एमपीपीएससी परीक्षा करवाई. वे क्वालिफाई कर गए तो उनको हमने वापस रख लिया. जो यूजीसी की योग्यता ही पूरी नहीं करते उनको तो हम नियमित कर नहीं सकते हैं. इसलिए पहले खुद को योग्य बनाओ और वापस आओ. योग्य न होने पर भी वे नियमितीकरण चाहते हैं तो ऐसा करना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है.’

यह कहने पर कि अनेक ऐसे गेस्ट लेक्चरर हैं जो यूजीसी की अहर्ताएं पूरी करते हैं लेकिन उनका कहना है कि एमपीपीएससी की परीक्षा पास नहीं कर सके, उन्हें भी बाहर किया गया है. जबकि वचन-पत्र में चयन न होने पर भी न निकाले जाने की बात की गई थी.

इस पर रवि कहते हैं, ‘हमने 2100-2200 लोग एमपीपीएससी से लिए हैं, उनको हमें जगह देनी है. जिन जगहों पर उन्हें नियुक्ति देनी है, उन्हें खाली करने के लिए गेस्ट लेक्चरर्स को वॉक आउट तो करना ही पड़ेगा न. फिर भी कह रहे हैं कि खुद को क्वालीफाइड कर लो, हम मना थोड़ी कर रहे हैं.’

गेस्ट लेक्चरर्स को लेकर बीते चार जनवरी को कमलनाथ सरकार की कैबिनेट बैठक भी हुई, जिसमें तय हुआ कि आंदोलनरत गेस्ट लेक्चरर्स को समायोजित करने के लिए 1000 नए पद सृजित किए जाएंगे. लेकिन, वित्त विभाग ने यह कहकर इसमें अड़ंगा लगा दिया कि सरकारी खजाने पर इससे बोझ बढ़ जाएगा.

वहीं, नियमतीकरण की बात पर मंत्रियों में भी मतभेद उभर आए. निराकरण के लिए मुख्यमंत्री कमलनाथ ने उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन कर दिया. गौरतलब है कि इससे पहले भी पांच मंत्रियों की एक कमेटी बनाई गई थी लेकिन वह भी समस्या का समाधान नहीं कर सकी.

इस बीच बीते 16 जनवरी को गेस्ट लेक्चरर्स का मामला उच्च शिक्षा विभाग ने राज्य कर्मचारी आयोग को सौंप दिया. आयोग इस संबंध में तथ्य जुटाकर उच्च शिक्षा विभाग को अपनी सिफारिशें देगा.

इस कदम को उलझाने वाला ठहराते हुए देवराज सिंह कहते हैं, ‘आयोग का गठन तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की समस्याएं हल करने के लिए हुआ था. हम उस दायरे में नहीं आते हैं. सरकार इसी तरह बार-बार कभी कमेटियां बनाकर, कभी झूठे आश्वासन देकर तो कभी आयोग की आड़ लेकर मामले को उलझाए रखना चाहती है.’

गेस्ट लेक्चरर्स के समर्थन में अब विपक्षी दल भाजपा भी उतर आई है. विपक्ष लगातार विधानसभा में यह मुद्दा उठा रहा है.

भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल कहते हैं, ‘गेस्ट लेक्चरर्स को भाजपा ने न केवल नौकरी पर रखा हुआ था बल्कि उनका वेतन भी बढ़ाकर 30 हजार रुपये महीना किया था. कांग्रेस ने चुनावों से पहले उन्हें नियमित करने का वादा किया, लेकिन पैसा बढ़ाना और नियमित करना तो दूर, अब नौकरी से निकाल रहे हैं.’

उनका कहना है, ‘गेस्ट लेक्चरर्स में अधिकतर ऐसे हैं जो योग्य और अनुभवी हैं. लंबे समय से पढ़ा रहे हैं. अब उनकी उम्र भी ज्यादा हो गई है. उनके सामने परिवार पालने का संकट आ खड़ा हुआ है. कुल मिलाकर अतिथि विद्वानों को धोखा देने का काम किया है.’

भोपाल के शाहजहांनी पार्क में पिछले डेढ़ महीने से तकरीबन पांच हज़ार गेस्ट लेक्चचर डटे हुए हैं.

भोपाल के शाहजहांनी पार्क में पिछले डेढ़ महीने से तकरीबन पांच हज़ार गेस्ट लेक्चचर डटे हुए हैं.

वे आगे कहते हैं, ‘दरअसल सरकार झूठ परोस रही है. अब तक उसके पास अतिथि विद्वानों को लेकर कोई नीति नहीं है. कई महीनों से उन्हें वेतन तक नहीं मिला है. कुल मिलाकर उन्हें बेरोजगार कर रहे हैं. कमलनाथ सरकार ने एक साल में एक भी सरकारी नौकरी नही दी. अक्टूबर 2019 के बाद से प्रदेश में शिक्षित पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या सात लाख से ज्यादा बढ़ी है. स्वयं मुख्यमंत्री ने विधानसभा में यह आंकड़ा दिया था.’

सरकार ने महीनों से वेतन भी नहीं दिया है

गेस्ट लेक्चरर्स को चार से आठ माह तक वेतन नहीं मिला है. इस बात की पुष्टि आंदोलनरत शिक्षकों ने भी की.

45 वर्षीय सुरेश कुमार विमल 80 फीसदी तक शारीरिक रूप से अक्षम हैं. वे हाथों के बल चलते हैं. दस सालों से अध्यापन का कार्य करा रहे सुरेश बैतूल जिले के भैंसदेही शासकीय महाविद्यालय में तैनात थे. उन्हें भी सेवा समाप्ति का पत्र मिल चुका है.

वे बताते हैं, ‘छह महीने से शासन ने मेरा वेतन रोक रखा है. किसी भी गेस्ट लेक्चरर को इस दौरान वेतन नहीं मिला है. उधार लेकर घर खर्च चला रहे हैं. मकान मालिक को किराया नहीं दे पा रहे हैं. बेरोजगार हैं, घर जाकर क्या करेंगे, इसलिए 42 दिन से यहां इस आस में बैठे है कि सरकार हमारी सुन ले. गांधीयालय नामक एक सामाजिक संस्था हमें एक समय का खाना खिला जाती है, उसी के सहारे डटे हैं.’

सेवा समाप्ति का नोटिस पा चुके भिंड जिले के एमजेएच कॉलेज में तैनात रहे 46 वर्षीय राज नारायण सिंह के लिए अपनी बीबी और दो बच्चों का पेट पालना भी मुश्किल हो रहा है.

वे कहते हैं, ‘परिवार में मैं ही अकेला कमाने वाला हूं. सरकार ने कॉलेज को बजट नहीं दिया है, इसलिए आठ-दस महीनों से वेतन नहीं मिला है.’

दूसरे अतिथि विद्वानों के सामने भी ऐसी ही चुनौतियां हैं. भोपाल के नरेला शासकीय महाविद्यालय में तैनात रईस खान को अभी तक सेवा समाप्ति का नोटिस तो नहीं मिला है लेकिन जुलाई के बाद से उन्हें भी वेतन नहीं मिला है.

हालांकि, कांग्रेस प्रवक्ता रवि सक्सेना वेतन न मिलने की बात से इनकार करते हुए कहते हैं, ‘किसी का कोई वेतन नहीं रुका है. ये लोग कॉलेज जाते नहीं हैं, पढ़ाते नहीं हैं, तो वेतन किस बात का? या तो आंदोलन कर लो या तो वेतन ले लो. अब बिना पढ़ाए वेतन लेना चाहते हो तो ये नहीं चलेगा.’

इस पर गेस्ट लेक्चरर्स का कहना है कि कॉलेज में उनकी उपस्थिति चेक की जा सकती है. देवराज सिंह कहते हैं, ‘सरकार और कांग्रेस पार्टी संवेदनहीनता का परिचय दे रही है. यह हास्यास्पद और शर्मनाक है कि उन्हें यह तक नहीं पता कि हमें प्रति कार्य दिवस 1500 रुपये के हिसाब से भुगतान होता है. चाहे छात्र आएं या न आएं, क्लास हो या न हो, सुबह दस बजे से शाम पांच बजे तक हमारी हाजिरी रहती है. इस दौरान हमसे शैक्षणिक और गैर शैक्षणिक दोनों काम कराए जाते थे.’

जिन्हें नोटिस नहीं मिला है, उनका वेतन कम करने का आरोप

आंदोलनरत शिक्षकों कहते हैं कि जिन गेस्ट लेक्चरर्स की अभी सेवा समाप्त नहीं की है, उनके लिए 17 दिसंबर को जारी एक पत्र में सरकार ने शर्त डाल दी है. जिसके मुताबिक, अगर कोई अतिथि विद्वान महीने में 20 कार्य दिवसों पर काम नहीं करता है तो उसे 1500 रुपये प्रतिदिन वेतन नहीं दिया जाएगा, बल्कि 1100 से 1200 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से दिया जाएगा. जबकि पहले ऐसा कोई नियम नहीं था.

इन्हीं कारणों के चलते राज नारायण मायूस होकर कहते हैं, ‘साथ तो हमारा भाजपा सरकार ने भी नहीं दिया था, तभी तो हम अस्थायी ही बने रहे. बस अंतर इतना है कि पिछली सरकार ने हमें निकाला नहीं था और जाते-जाते वो हमारा वेतन 35-40 हजार प्रति माह तक कर गए थे. पहले 825 रुपये प्रतिदिन मिला करते थे, उन्होंने बढ़ाकर 1500 रुपये किया. कांग्रेस सरकार से उम्मीद कुछ अच्छे की थी, लेकिन उन्होंने हमें नियमित करने का वचन देकर हमें बेरोजगार ही कर दिया.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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