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फसलों के उचित दाम देने वाली योजना के बजट में बड़ी कटौती, 2019-20 के लिए भी फंड घटा

मोदी सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य को पाने के लिए पिछले कुछ सालों में कई कृषि योजनाओं को लॉन्च किया था. हालांकि इनके लागू होने की खराब स्थिति के चलते सरकार ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिए इन योजनाओं के आवंटित बजट में बड़ी कटौती की है.

नई दिल्ली: साल 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करना मोदी सरकार की महत्वाकंक्षी लक्ष्यों में से एक है. इसके लिए सरकार ने पिछले कुछ सालों में कई बड़ी योजनाओं को लॉन्च किया था. हालांकि इनके लागू होने की खराब स्थिति के चलते सरकार ने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए इन योजनाओं के बजट (संशोधित अनुमान) में भारी कटौती की है.

कृषि मंत्रालय की महत्वपूर्ण प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) योजना के तहत वित्त वर्ष 2019-20 के लिए 75,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था. हालांकि शनिवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा वित्त वर्ष 2020-21 के लिए पेश गए बजट के मुताबिक सरकार ने इस योजना की फंडिंग या संशोधित अनुमान (रिवाइज्ड एस्टिमेट या आरई) को घटाकर 54370.15 करोड़ रुपये कर दिया है.

संशोधित अनुमान का मतलब है कि शुरुआती आवंटन के मुकाबले 31 मार्च 2020 तक सरकार द्वारा योजना के तहत इतनी राशि खर्च किए जाने की संभावना है.द वायर द्वार आरटीआई के तहत प्राप्त जानकारी से पता चलता है कि पीएम किसान योजना के तहत जनवरी 2020 तक में 48000 करोड़ रुपये की ही राशि खर्च की जा सकी थी.

पीएम किसान के तहत किसानों को एक साल में 2000 रुपये की तीन किस्त के जरिए कुल 6000 रुपये देने थे.

आज अपने बजट भाषण में निर्मला सीतारमण ने जल संरक्षण के तहत सिंचाई के लिए माइक्रो इरिगेशन की तकनीकि पर जोर देने की बात की. उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ऐसा करने के लिए प्रतिबद्ध है. आर्थिक सर्वेक्षण, 2019-20 में भी सरकार से कहा गया है कि वे सिंचाई के लिए किसानों के बीच माइक्रो इरिगेशन को बढ़ावा दें.

हालांकि आंकड़ों से पता चलता है कि इस योजना को भी सही तरीके से लागू नहीं किया जा रहा है और बजट में आंवटित राशि के मुकाबले काफी कम खर्च हो पा रहा है. माइक्रो इरिगेशन के लिए कृषि मंत्रालय की ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना- पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ के लिए पिछले साल के बजट में 3500 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था.

हालांकि इस साल के बजट के मुताबिक सरकार ने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए इस योजना के संशोधित अनुमान को घटाकर 2032.20 करोड़ रुपये कर दिया है. यानी कि 31 मार्च 2020 तक इतनी राशि खर्च होने की संभावना है. साल 2018-19 के दौरान कृषि मंत्रालय ने माइक्रो इरिगेशन, जिसमें ड्रिप और स्प्रिंकलर इरिगेशन इत्यादि शामिल हैं, के लिए 2918.37 करोड़ रुपये खर्च किया था.

इसी तरह सरकार ने तिलहन और कोपरा की खरीदी के लिए लाई गई प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण योजना (पीएम-आशा), किसानों को पेंशन देने के लिए लाई गई प्रधानमंत्री किसान मान धन योजना, बाजार हस्तक्षेप योजना और मूल्य समर्थन योजना (एमआईएस-पीएसएस), परंपरागत कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, मृदा स्वास्थ्य और उर्वरता पर राष्ट्रीय परियोजना, बागवानी पर राष्ट्रीय मिशन, कृषि मार्केटिंग पर एकीकृत योजना, राष्ट्रीय बांस मिशन इत्यादि के 2019-20 के बजट को कम कर दिया है.

पीएम-आशा योजना के तहत साल 2019-20 के लिए 1500 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था, जिसे घटाकर 321 करोड़ रुपये कर दिया गया है. यह सीधे करीब 79 फीसदी की कटौती है. वहीं, प्रधानमंत्री किसान मान धन योजना को वर्तमान वित्त वर्ष 2019-20 के लिए 900 करोड़ रुपये दिए गए थे, जिसे कम करके 200 करोड़ रुपये कर दिया गया है.

आलम ये है कि किसानों को एमएसपी सुनिश्चित करने के लिए लाई गई पीएम-आशा योजना का बजट मौजूदा वित्त वर्ष 2020-21 के लिए घटाकर सिर्फ 500 करोड़ रुपये कर दिया गया है.

परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत विभिन्न तरीके से जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाता है. इसमें सरकार द्वारा बहुप्रचारित जीरो बजट फार्मिंग भी शामिल है. हालांकि इस योजना के तहत भी आवंटित राशि खर्च नहीं हो रही है. वर्तमान वित्त वर्ष 2019-20 में इस योजना के लिए 325 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था, जिसे घटा कर 299.36 कर दिया गया है.

इसी तरह कृषि मार्केटिंग पर एकीकृत योजना के लिए 600 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया जिसे अब करीब 50 फीसदी कम करके 331.10 करोड़ कर दिया गया है. कृषि उत्पादों का सही तरीके से भंडारण क्षमता के लिए यह योजना काफी महत्वपूर्ण है. वित्त वर्ष 2020-21 के लिए इसका बजट पिछले साल के मुकाबले घटाकर 490 करोड़ रुपये कर दिया गया है.

कृषि संगठन और खेती-किसानी के मुद्दे पर काम करने वाले विशेषज्ञों ने इस बजट पर काफी निराशा जताई है और कहा है कि ये कृषि संकट का समाधान नहीं कर पाएगा.

कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने कहा, ‘सभी लोग ये बात कर रहे थे कि आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए ग्रामीण मांग को बढ़ाने की जरूरत है. हालांकि बजट में इस दिशा में कोई खास बातें नहीं हैं. इस वर्ष कृषि, सिंचाई, संबद्ध गतिविधियों और ग्रामीण विकास का बजट 2.83 लाख करोड़ रुपये है.पिछले साल यह 2.63 लाख करोड़ रुपये था.’

बाजार हस्तक्षेप योजना और मूल्य समर्थन योजना के लिए मौजूदा वित्त वर्ष में 3000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था लेकिन अब इसे घटाकर 2010.20 करोड़ रुपये कर दिया है. इसके अलावा वित्त वर्ष 2020-21 के लिए योजना का बजट पिछले साल के मुकाबले घटाकर 2000 करोड़ रुपये कर दिया गया है.

विशेषज्ञों ने इसे लेकर चिंता जताई है कि जो योजना किसानों के लिए मददगार है और उनके उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलाने में मदद कर सकती है, उसी की फंडिंग को घटाया जा रहा है.

इस योजना के तहत नैफेड, सेंट्रल वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन, नेशनल कंज्यूमर कोऑपरेटिव फेडरेशन ऑफ इंडिया और स्मॉल फार्मर्स एग्रो बिज़नेस कंसोर्टियम को मूल्य समर्थन योजना के तहत तिलहन और दलहन की खरीद के लिए केंद्रीय एजेंसियों के रूप में नामित किया गया है. किसानों को उनकी उपज के लिए सही मूल्य प्रदान करने की इनकी जिम्मेदारी होती है.

स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कृषि मामलों के जानकार योगेंद्र यादव ने कहा कि इस बजट में खेती, गांव, किसान पर खुला तीन तरफा हमला बोल दिया गया है.

उन्होंने कहा, ‘भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को खरीद का अनुदान (सब्सिडी) घटाने का फैसला लेने की वजह से अब फसल का दाम कम होगा.’

वित्त वर्ष 2019-20 के लिए एफसीआई को 1,51,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी देने का आवंटन किया गया था जिसे वित्त वर्ष 2020-21 में घटाकर 75,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है.

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