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भाजपा शासित राज्यों समेत कई प्रदेशों ने की थी एमएसपी बढ़ाने की सिफ़ारिश, केंद्र ने ठुकराया

द वायर एक्सक्लूसिव: आरटीआई के तहत प्राप्त किए गए दस्तावेज़ बताते हैं कि महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश समेत कई अन्य राज्यों ने केंद्र द्वारा निर्धारित एमएसपी पर सहमति नहीं जताई थी. राज्यों ने अपने यहां की उत्पादन लागत के हिसाब से समर्थन मूल्य तय करने की सिफ़ारिश की थी, लेकिन केंद्र ने सभी प्रस्तावों को ख़ारिज कर दिया.

नई दिल्ली: संसद का बजट सत्र शुरु होने से पहले बीते 31 जनवरी को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने संसद के संयुक्त अधिवेशन में अपने अभिभाषण में कहा कि केंद्र सरकार किसानों को लागत का डेढ़ गुना मूल्य देने के लिए समर्पित भाव से काम कर रही है.

उन्होंने कहा कि खरीफ और रबी की फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में लगातार की गई वृद्धि इसी दिशा में उठाया गया कदम है. हालांकि राष्ट्रपति का ये दावा सरकारी फाइलों में दर्ज एमएसपी की हकीकत पर खरा नहीं उतरता है.

द वायर द्वारा सूचना का अधिकार कानून के तहत प्राप्त किए गए आधिकारिक दस्तावेजों से पता चलता है कि भाजपा शासित समेत कई राज्य सरकारों ने केंद्र सरकार द्वारा तय की गई फसलों की एमएसपी पर सहमति नहीं जताई थी और इसमें बदलाव करने की मांग की थी.

सरकारी फाइलों के मुताबिक राज्य सरकारों द्वारा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के मुताबिक C2 के आधार पर लागत का डेढ़ गुना दाम देने की मांग के बजाय केंद्र सरकार A2+FL के आधार पर लागत का डेढ़ गुना दाम दे रही है.

A2+FL लागत में सभी कैश लेनदेन और किसान द्वारा किए गए भुगतान समेत परिवार श्रम मूल्य शामिल होता है. इसमें पट्टे पर ली गई भूमि का किराया मूल्य भी शामिल होता है.

वहीं C2 में A2+FL लागत के साथ-साथ खुद की भूमि का किराया मूल्य और खुद की पूंजी पर ब्याज भी शामिल होता है.

पिछले साल तीन जुलाई को कैबिनेट ने 2019-20 सीजन के खरीफ फसलों की एमएसपी को मंजूरी दी थी, जिसमें 2018-19 सीजन की तुलना में धान की एमएसपी में 3.7 फीसदी, ज्वार में 4.9 फीसदी, बाजरा में 2.6 फीसदी, मक्का में 3.5 फीसदी, मूंग में 1.1 फीसदी, उड़द में 1.8 फीसदी, कपास में 2.0 फीसदी की मामूली वृद्धि की गई थी.

केंद्रीय कृषि मंत्रालय के कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों के आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने फसलों की इस एमएसपी को मंजूरी दी थी. हालांकि दस्तावेजों से पता चलता है कि छत्तीसगढ़, हरियाणा, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पुदुचेरी, तमिलनाडु, ओडिशा और कर्नाटक सरकार ने इसका विरोध किया था.

आलम ये है कि कैबिनेट बैठक से पहले तमिलनाडु और कर्नाटक सरकार की टिप्पणी आ जाने के बावजूद उनकी बातों को कैबिनेट नोट में शामिल नहीं लिया गया. कैबिनेट नोट वो महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है जिसके आधार पर कैबिनेट किसी भी विषय पर फैसला लेती है.

अगर एमएसपी के दायरे में आने वाली सभी फसलों को मिला दिया जाए तो C2 लागत के मुकाबले कुल लाभ का मार्जिन मात्र 14 फीसदी है. यानी की C2 लागत के मुकाबले सिर्फ 14 फीसदी अधिक राशि जोड़कर एमएसपी तय की गई है.

आधिकारिक दस्तावेजों से यह भी पता चलता है कि देश के अलग-अलग राज्यों में विभिन्न फसलों की अलग-अलग उत्पादन लागत होने की वजह से एक एमएसपी राज्यों के किसानों की मांगों को पूरा नहीं कर पाती है. इसे लेकर कई राज्यों ने आपत्ति जताई थी.

पश्चिम बंगाल

केंद्रीय कृषि सचिव संजय अग्रवाल द्वारा 22 अप्रैल 2019 को भेजे गए पत्र का आठ मई 2019 को जवाब देते हुए पश्चिम बंगाल सरकार ने कहा कि सीएसीपी ने धान की एमएसपी 1815 रुपये प्रति क्विंटल तय की है लेकिन राज्य ने अपने आकलन के आधार पर 2,100 रुपये प्रति क्विंटल का प्रस्ताव रखा है.

West Bengal MSP

धान की एमएसपी बढ़ाने की मांग करते हुए पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा भेजा गया पत्र.

राज्य के कृषि मंत्रालय के संयुक्त सचिव जितेंद्र रॉय ने अपनी गणना का हवाला देते हुए लिखा, ‘पश्चिम बंगाल के श्रम विभाग द्वारा तय की गई न्यूनतम मजदूरी को ध्यान में रखते हुए 2017-18 के दौरान धान की लागत का C2 मूल्य 1,751 रुपये था. चूंकि अब लागत में शामिल विभिन्न चीजों और लेबर चार्ज में औसत 9 फीसदी की बढ़ोतरी आई है इसलिए 2019-20 सीजन के दौरान राज्य में धान की C2 लागत की अनुमानित राशि 1,909 रुपये है.’

इस आधार पर पश्चिम बंगाल सरकार ने केंद्र से धान की एमएसपी 18,151 रुपये प्रति क्विंटल रखने के बजाय 2,100 रुपये प्रति क्विंटल करने की गुजारिश की थी. हालांकि सरकार ने राज्य की ये सिफारिश स्वीकार नहीं की.

छत्तीसगढ़

इसी तरह तीन मई 2019 को एक पत्र लिखकर छत्तीसगढ़ सरकार ने भी केंद्र से एमएसपी बढ़ाने की मांग की थी. अपने तीन पेज के पत्र में राज्य के कृषि विभाग ने प्रमुख खरीफ फसलों की लागत का विस्तार से गणना करते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने के लिए कहा था.

राज्य सरकार ने लागत में श्रम लागत, ऋणों पर ब्याज, लगान भूमि भाड़ा, रखवाली पर व्यय, परिवहन पर व्यय समेत कई बिंदुओं को शामिल करते हुए धान की एमएसपी 2,500 रुपये प्रति क्विंटल, रागी की 3,100 रुपये प्रति क्विंटल, मक्का की 1,800 रुपये प्रति क्विंटल, अरहर की 6,800 रुपये प्रति क्विंटल, मूंग की 7,300 रुपये प्रति क्विंटल, उड़द की 6,800 रुपये प्रति क्विंटल, मूंगफली की 5,800 रुपये प्रति क्विंटल, सोयाबीन की 3,800 रुपये प्रति क्विंटल, सूरजमुखी की 6,500 रुपये प्रति क्विंटल और तिल की 6,500 रुपये करने की सिफारिश की थी.

राज्य की मांग के विपरीत केंद्र ने काफी कम धान की एमएसपी 1,815 रुपये, रागी की 3,150 रुपये, मक्का की 1,760 रुपये, अरहर की 5,800 रुपये, मूंग की 7,050 रुपये, उड़द की 5,700 रुपये, मूंगफली की 5,090 रुपये, सोयाबीन की 3,710 रुपये, सूरजमुखी की 6,485 रुपये और तिल की 6,485 रुपये प्रति क्विंटल तय की है.

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा सिफारिश एमएसपी पर छत्तीसगढ़ सरकार ने लिखा, ‘छत्तीसगढ़ शासन के प्रस्ताव की तुलना में आयोग द्वारा सिफारिश की गई मूल्य विभिन्न फसलों में काफी कम है. अत: जिन फसलों में न्यूनतम समर्थन मूल्य राज्य शासन द्वारा प्रेषित प्रस्ताव से कम है, उनमें राज्य शासन द्वारा प्रस्तावित कॉलम क्रमांक 3 के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने हेतु आवश्यक कार्यवाही करने का कष्ट करें.’

Chhattisgarh MSP

छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा आकलन की गई उत्पादन लागत.

केंद्र द्वारा राज्य सरकार की प्रस्तावित एमएसपी नहीं स्वीकार करने की वजह से छत्तीसगढ़ सरकार ने धान पर बोनस देने की बात की थी. हालांकि केंद्र ने इसका कड़ा विरोध किया था. केंद्र ने यहां तक कह दिया था कि अगर छत्तीसगढ़ सरकार धान पर बोनस देती है तो वे इसे नहीं खरीदेंगे.

महाराष्ट्र

देवेंद्र फडणवीस की अगुवाई वाली महाराष्ट्र की तत्कालीन भाजपा-शिवसेना सरकार ने भी केंद्र द्वारा तय की गई खरीफ फसलों की एमएसपी पर असहमति जताई थी.

राज्य के कृषि विभाग के सचिव एकनाथ दावले ने एमएसपी बढ़ाने की मांग करते हुए 17 मई 2019 को भेजे पत्र में लिखा, ‘राज्य सरकार ने 29 मार्च 2019 को पत्र लिखकर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सुक्षाव और प्रस्ताव भेजा था. लेकिन कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा खरीफ फसलों के लिए तय की गई एमएसपी राज्य सरकार के प्रस्ताव के मुकाबले काफी कम है.’

पत्र में आगे लिखा गया, ‘इसलिए आपसे गुजारिश है कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा भेजे गए पहले के प्रस्तावों पर विचार करें और खरीफ फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाएं.’

तत्कालीन फडणवीस सरकार ने धान की एमएसपी 3,921 रुपये, ज्वार की 3,628 रुपये, बाजरा की 4,002 रुपये, मक्का की 2,001 रुपये, अरहर की 6,161 रुपये, मूंग की 9,943 रुपये, उड़द की 8,556 रुपये, मूंगफली की 9,416 रुपये, सोयाबीन की 5,755 रुपये, सूरजमुखी की 7,534 रुपये और कपास की 7,664 रुपये प्रति क्विंटल करने की सिफारिश की थी.

ये राशि केंद्र द्वारा निर्धारित की गई एमएसपी की तुलना में काफी ज्यादा है. वहीं केंद्र सरकार ने पहले ही चेतावनी दे दी थी कि कोई भी राज्य तय एमएसपी पर बोनस देकर खरीद नहीं करेंगे क्योंकि इससे बाजार में विकृति आती है.

हरियाणा

इसी तरह भाजपा शासित एक अन्य राज्य हरियाणा ने भी खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग की थी. राज्य ने कहा कि सिफारिश की गई एमएसपी उत्पादन लागत के बराबर भी नहीं है.

राज्य के कृषि विभाग ने सीएसीपी की रिपोर्ट का आकलन करने के बाद 18 मई 2019 को भेजे अपने पत्र में कहा, ‘यह बताना जरूरी है कि डीजल, कीटनाशक, उर्वरक, मशीन और खेती में शामिल अन्य चीजों के दाम पिछली साल की तुलना में बढ़ गए हैं. मजदूरों की कमी होना लागत में बढ़ोतरी होने का एक बहुत बड़ा कारण है.’

राज्य ने आगे कहा, ‘सीएसीपी द्वारा प्रस्तावित मूल्य हरियाणा में बढ़ी लागत के मुकाबले काफी कम है. हरियाणा देश में सबसे ज्यादा चावल उत्पादन करने वाले राज्यों में से एक है. लेकिन पिछले साल की तुलना में चावल की एमएसपी में सिर्फ 65 रुपये की बढ़ोतरी की सिफारिश की गई है.’

हरियाणा के कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने सीएसीपी द्वारा सिफारिश की गई एमएसपी को खारिज करते हुए कहा कि यह राज्य में लागत का दाम बढ़ने के अनुरूप नहीं है. राज्य की खट्टर सरकार ने धान की एमएसपी 1,815 रुपये प्रति क्विंटल के बजाय 2,677 रुपये प्रति क्विंटल तय करने को कहा था.

अपने दो पेज के पत्र में हरियाणा ने कहा, ‘कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा सिफारिश की गई एमएसपी उत्पादन लागत के बराबर भी नहीं है. हरियाणा के किसानों के हित में धान की एमएसपी कम से कम 2,650-2,750 रुपये प्रति क्विंटल रखा जाना रखी जानी चाहिए.’

बारिश पर निर्भर वाले क्षेत्रों के किसानों की संकटग्रस्त आर्थिक स्थिति बयान करते हुए हरियाणा सरकार ने कहा कि ऐसे क्षेत्रों के लिए बाजरा काफी उपयुक्त फसल होती है क्योंकि इसमें काफी कम पानी लगता है. लेकिन बाजरे की भी एमएसपी केंद्र द्वारा काफी कम रखी गई है.

उन्होंने कहा, ‘राज्य के कृषि विभाग द्वारा आकलन में पता चला है कि बाजरे की उत्पादन लागत 2,170 रुपये प्रति क्विंटल है. लेकिन सीएसीपी ने इसी एमएसपी सिर्फ 2,000 रुपये प्रति क्विंटल रखने की सिफारिश की है. इस प्रकार राज्य का सुझाव है कि बाजरा की एमएसपी 2,200 रुपये प्रति क्विंटल रखी जानी चाहिए.’

लेकिन बावजूद इसके केंद्र ने बाजरा की एमएसपी नहीं बढ़ाई. यही हाल मक्के का भी है. हरियाणा सरकार ने अपने पत्र में कहा कि मक्का एक महत्वपूर्ण अनाज और पशुओं के चारे की फसल है लेकिन लगातार एमएसपी कम रहने की वजह से इसका उत्पादन क्षेत्र अचानक से कम हुआ है.

मालूम हो कि पंजाब, हरियाणा जैसे राज्य अंधाधुंध धान के उत्पादन की वजह से इस समय भयानक पानी की संकट से जूझ रहे हैं. इसलिए सरकार इस समय धान के बजाय अन्य फसलों पर ध्यान देने की बात कर रही है जिसमें पानी कम लगता हो.

हरियाणा सरकार ने मक्के का इस्तेमाल जल संरक्षण की दिशा में करने का सुझाव देते हुए कहा, ‘धान की तुलना में मक्का काफी कम पानी लेता है और इसके उत्पादन को जल संरक्षण और फसल विविधीकरण की दिशा में बढ़ावा दिया जाना चाहिए.’

राज्य सरकार ने कहा कि वे इस समय धान की जगह पर मक्का उगाने की कोशिश कर रहे हैं इसलिए किसानों को सही एमएसपी देने की जरूरत है ताकि इसके उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सके. लेकिन राज्य सरकार के मुताबिक केंद्र ने इसकी एमएसपी इतनी भी नहीं रखी है कि उत्पादन लागत भी कवर कर सके.

राज्य ने कहा, ‘सीएसीपी ने मक्के की एमएसपी 1,760 रुपये रखने का सुझाव दिया है जो कि बहुत कम है और उत्पादन लागत के बराबर भी नहीं है. मक्के की एमएसपी 2,350 रुपये प्रति क्विंटल तय की जानी चाहिए.’

कीटनाशकों के बढ़ते हमले की वजह से उत्पादन लागत बढ़ने का हवाला देते हुए खट्टर सरकार ने केंद्र से कहा कि वे कपास की एमएसपी 5,255 रुपये के बजाय 7,000 रुपये प्रति क्विंटल रखें. उन्होंने कहा कि सीएसीपी द्वारा सिफारिश की गई राशि किसानों के लागत की भरपाई नहीं करती है.

इसके अलावा हरियाणा अरहर, मूंग, उड़द और मूंगफली की एमएसपी क्रमश: 7,850 रुपये, 9,500 रुपये, 7,400 रुपये और 6,600 रुपये प्रति क्विंटल रखने की सिफारिश की.

राजस्थान

केंद्र द्वारा एमएसपी तय करने को लेकर कृषि मंत्रालय के 22 अप्रैल 2019 के पत्र का 13 मई 2019 को जवाब देते हुए राजस्थान सरकार सीएसीपी द्वारा सिफारिश की गई एमएसपी पर असहमति जताई और राज्य में लागत के बढ़े दाम का हवाला देते हुए एमएसपी बढ़ाने की मांग की.

राज्य सरकार ने अपने पत्र में लिखा, ‘राज्य के अधिकांश भाग में मरुस्थलीय क्षेत्र होने एवं वर्षा की विषम परिस्थितियों के कारण फसलों की लागत अन्य राज्यों की तुलना में अधिक रहती है.’

इस आधार पर राजस्थान ने बाजरा, मक्का, सोयाबीन, उड़द और मूंग की खरीद मूल्य बढ़ाने की मांग की. राज्य सरकार ने कहा कि भारत सरकार द्वारा तय किए गए मक्का की एमएसपी 2,000 रुपये प्रति क्विंटल के बजाय 2,200 रुपये प्रति क्विंटल रखी जानी चाहिए.

इसके अलावा मक्का की एमएसपी 1,760 रुपये प्रति क्विंटल के बजाय 2,650 रुपये प्रति क्विंटल, सोयाबीन की एमएसपी 3,710 रुपये प्रति क्विंटल के बजाय 4,500 रुपये प्रति क्विंटल, उड़द की 5,700 रुपये के बजाय 6,200 रुपये और मूंग की एमएसपी 7,050 रुपये के बजाय 8,601 रुपये प्रति क्विंटल रखी जानी चाहिए.

राजस्थान के मुख्य सचिव डीबी गुप्ता ने केंद्र के कृषि सचिव संजय अग्रवाल को भेजे पत्र में लिखा, ‘चूंकि इन फसलों हेतु बुवाई एवं उत्पादन दोनों ही दृष्टि से राजस्थान राज्य का देश में महत्वपूर्ण स्थान है, अत: कृपया इन फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारण में राज्य द्वारा प्रेषित न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रस्तावों को और अधिक प्रमुखता व महत्व प्रदान करवाने का श्रम कराएं.’

हालांकि केंद्र द्वारा राज्य की इन मांगों को स्वीकार नहीं किया गया.

उत्तर प्रदेश

केंद्र द्वारा 2019-20 सीजन के लिए खरीफ फसलों की प्रस्तावित एमएसपी पर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने भी सहमति नहीं जताई थी. राज्य सरकार ने राज्य की उत्पादन लागत के मुताबिक एमएसपी तय करने की सिफारिश की थी. द वायर द्वारा प्राप्त किए गए उत्तर प्रदेश सरकार के 12 पेज के गोपीनय पत्र से इसका खुलासा होता है.

राज्य सरकार ने कृषि मंत्रालय को भेजे अपने पत्र में कहा, ‘फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों के निर्धारण का मुख्य आधार उनकी उत्पादन लागत होती है. फसलों के उत्पादन लागत मूल्य, उनकी उपज के लिए प्रयुक्त मानव श्रम, पशु श्रम, मशीन श्रम, भूमि का किराया तथा कृषि निवेश आदि पर किए गए व्यय पर निर्भर करते हैं.’

योगी सरकार ने प्रदेश में लघु एवं सीमांत किसानों की संख्या अधिक होने, प्रदेश में जोत का आकार काफी छोटा होने और किसानों की संसाधन तथा कृषि निवेशों के अपयोग की क्षमता कम होने के कारण एमएसपी में बढ़ोतरी की मांग की थी.

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आंकलन की गई राज्य की उत्तपादन लागत.

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आकलन की गई राज्य की उत्तपादन लागत.

राज्य सरकार के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 92.81 फीसदी लघु एवं सीमांत किसान हैं. प्रदेश में जोतों का आकार मात्र 0.73 हेक्टेयर है और सीमांत किसानों के लिए यह मात्र 0.38 हेक्टेयर है.

प्राप्त दस्तावेजों से पता चलता है कि कृषि लागत एवं मूल्य आयोग और उत्तर प्रदेश सरकार के उत्पादन लागत के आकलन में काफी अंतर है जिसकी वजह से राज्य सरकार एमएसपी बढ़ाने की मांग कर रही थी.

उत्तर प्रदेश सरकार ने कृषि सांख्यिकी एवं फसल बीमा के निदेशक की अगुवाई में प्रदेश के कृषि विश्वविद्यालयों के कृषि अर्थशास्त्रियों के साथ मिलकर उत्पादन लागत का आकलन किया गया था. राज्य ने उत्पादन लागत में मानव श्रम, मशीन श्रम, औषधि का मूल्य, बीमा का प्रीमियम, भूमि का किराया ब्याज समेत कई चीजों को शामिल किया था.

इस आधार पर राज्य ने धान का उत्पादन लागत (C2) 1679 रुपये प्रति क्विंटल लगाया और इसकी एमएसपी 2,520 रुपये प्रति क्विंटल रखने की सिफारिश की थी. जबकि केंद्र ने धान का उत्पादन लागत (C2) 1,619 रुपये प्रति क्विंटल लगाया और इसकी एमएसपी सिर्फ 1,815 रुपये प्रति क्विंटल तय की.

अन्य फसलों को लेकर सीएसीपी द्वारा प्रोजेक्टेड उत्पादन लागत उत्तर प्रदेश सरकार की तुलना में ज्यादा है. लेकिन सीएसीपी प्रस्तावित एमएसपी राज्य सरकार की तुलना में काफी कम है. इसका कारण ये है कि सीएसीपी ने C2 उत्पादन लागत के आधार पर नहीं बल्कि A2+FL उत्पादन लागत (जो कि C2 के मुकाबले काफी कम होता है) के आधार पर एमएसपी तय की है.

उत्तर प्रदेश ने बाजरा की एमएसपी 2,265 रुपये, मक्का की 2,225 रुपये, उड़द की 6,225 रुपये, मूंग की 6,375 रुपये, अरहर की 5,855 रुपये, मूंगफली की 5,390 रुपये, सोयाबीन की 4,245 रुपये और तिल की 6,660 रुपये प्रति क्विंटल करने की सिफारिश की थी.

हालांकि केंद्र ने राज्य की इन सिफारिशों को नहीं माना.

राज्य सरकार ने लिखा, ‘प्रदेश के कृषकों को उनकी फसलों के लाभकारी मूल्य दिलाने एवं प्रदेश की अधिकांश जनसंख्या कृषि एवं कृषि से संबंधित व्यवसाय पर निर्भर होने को ध्यान में रखते हुए प्रदेश के कृषि विभाग द्वारा अनुमानित किए गए मूल्यों के अनुरूप फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किए जाने चाहिए ताकि कृषकों को उनकी फसलों के लाभकारी मूल्य प्राप्त हो सकें एवं कृषकों को कृषि क्षेत्र से पलायन होने से रोका जा सके.’

तमिलनाडु

तमिलनाडु सरकार ने कहा कि 2019-20 सीजन के लिए खरीफ फसलों की प्रस्तावित एमएसपी किसानों की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है.

24 जून 2019 को भेजे पत्र में इसका कारण बताते हुए राज्य सरकार ने कहा, ‘हर साल बारिश, पानी की उपलब्धता, बांध से पानी छोड़ना और इसकी लागत में उतार-चढ़ाव और पूरे साल बहने वाली नदियों का खत्म होना उत्पादन लागत में प्रमुख भूमिका निभाता है.’

राज्य ने आगे कहा, ‘दालों के संदर्भ में, कम उत्पादन और अन्य खाद्यान्नों के लिए अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य ने दालों की खेती को हाशिए पर धकेल दिया है. इसलिए दालों की एमएसपी बढ़ाकर इसके उत्पादन को प्रोत्साहन दिया जा सकता है.‘

तमिलनाडु सरकार ने कहा, ‘सिर्फ उत्पादन लागत मूल्य ही न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित नहीं करता है. किसानों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति जैसे फैक्टर को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए ताकि किसानों को गरिमामय जीवन दिया जा सके.’

इस आधार पर राज्य सरकार ने धान की एमएसपी 2,700 रुपये, ज्वार की 2,750 रुपये, बाजरा की 2,150 रुपये, रागी की 3,150 रुपये, मक्का की 2,100 रुपये, तुअर (अरहर) की 6,300, मूंग की 7,700, उड़द की 6,200 रुपये, मूंगफली की 5,400 रुपये और कपास की 6,200 रुपये करने की सिफारिश की थी.

इसके अलावा राज्य ने अतिरिक्त लंबे स्टेपल कपास की एमएसपी 9,000 रुपये से 10,000 रुपये प्रति क्विंटल तय करने की मांग की थी. तमिलनाडु सरकार ने कहा कि अतिरिक्त लंबे स्टेपल कपास की अलग से न्यूनतम समर्थन मूल्य तय कने की जरूरत है ताकि कपास किसानों को इस फसल को उगाने में बढ़ावा दिया जा सके.

हालांकि केंद्र ने राज्य की इन सिफारिशों को स्वीकार नहीं किया.

ओडिशा

ओडिशा सरकार ने केंद्र द्वारा सिफारिश की गई एमएसपी पर असहमति जताते हुए कहा था कि कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की रिपोर्ट से पता चलता है कि सरकार ने A2+FL लागत के आधार पर एमएसपी की सिफारिश की गई है, जबकि राज्य का सुझाव है कि C2 लागत के आधार पर एमएसपी तय की जानी चाहिए जो उत्पादन लागत का बेहतर आकलन है.

एक जुलाई 2019 को भेजे अपने गोपनीय पत्र में राज्य ने कहा, ‘ओडिशा एक प्रमुख धान उत्पादक राज्य है और यहां पर भंडारण का काफी दुरुस्त सिस्टम है, इसलिए धान की एमएसपी में मामूली वृद्धि से राज्य के किसानों को शायद ही कोई लाभ मिले.’

Odisha letter for MSP

खरीफ फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग करते हुए ओडिशा सरकार द्वारा भेजा गया पत्र.

ओडिशा ने राज्य में उत्पादन लागत का आकलन कर एमएसपी 2,930 रुपये प्रति क्विंटल रखने की सिफारिश की थी. वहीं मक्के की 1,800 रुपये, रागी की 3,000 रुपये, अरहर की 5,900 रुपये, मूंग की 7,400 रुपये, उड़द की 5,850 रुपये, मूंगफली की 5,140 रुपये, सूरजमुखी की 5,500 रुपये और कपास की 5,350 व 5,650 रुपये प्रति क्विंटल तय करने की सिफारिश की थी.

केंद्र ने राज्य की इन सिफारिशों को स्वीकार नहीं किया.

कर्नाटक

इसके अलावा कर्नाटक की तत्कालीन कांग्रेस-जेडीएस सरकार ने 29 जून 2019 को पत्र लिखकर केंद्र सरकार से स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के आधार पर C2 लागत का डेढ़ गुना देने की मांग की थी और केंद्र द्वारा तय की गई एमएसपी को खारिज कर दिया था.

राज्य ने कर्नाटक कृषि मूल्य आयोग द्वारा साल 2016 से किसानों द्वारा ऑनलाइन माध्यम से इकट्ठा की गई जानकारी के आधार पर कहा कि उनके द्वारा आकलन की गई उत्पादन लागत सीएससीपी के उत्पादन लागत के मुकाबले काफी कम है.

राज्य ने कहा था, ‘इसलिए 2019-20 सीजन के लिए तय की गई एमएसपी राज्य के उत्पादन लागत की तुलना में अपर्याप्त है. इसकी वजह से किसानों के मुनाफे का अंतर या तो कम है या फिर नकारात्मक है.’

राज्य ने उत्पादन लागत और एमएसपी की तुलना करते हुए अपने पत्र में लिखा कि कि अरहर के मामले में एमएसपी A1+FL लागत के बराबर भी नहीं है, जिसके कारण किसानों को कोई फायदा पहुंचता नहीं दिखता है.

चूंकि कर्नाटक में जमीन को लीज पर देने की कानूनी मंजूरी नहीं है इसलिए A1 लागत और A2 लागत एक जैसे होते हैं.

कर्नाटक सरकार ने लिखा, ‘अगर केएपीसी द्वारा आकलन किए गए C2 लागत को शामिल किया जाता है तो मक्का और मूंग को छोड़कर अन्य फसलों के लिए लाभ का अंतर नकारात्मक हो जाता है. पूरे देश में एक जैसी एमएसपी लागू होने की बात को ध्यान में रखते हुए अगर A1+FL लागत की जगह C2 लागत को शामिल किया जाता है तो ये भारत के राज्यों की उत्पादन लागत में असमानता की समस्या का समाधान कर देता.’

इन बातों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने कहा कि राज्य की उत्पादन लागत को ध्यान में रखते हुए किसानों की भरपाई के लिए प्रस्तावित एमएसपी के ऊपर राज्य सरकार को बोनस दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘इसलिए सीएसीपी का ये कहना कि बोनस देने की वजह से बाजार में विकृति आती है, इस पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए.’

इसके अलावा राज्य सरकार ने अपने 10 पेज के लंबे पत्र में कृषि से जुड़ी अन्य समस्याओं का समाधान करने का भी सुझाव दिया था. हालांकि केंद्र ने राज्य की इन सिफारिशों को स्वीकार नहीं किया, इसलिए पिछले साल के दिसंबर महीने में राज्य सरकार ने ऐलान किया कि वे अरहर की एमएसपी पर 300 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस देंगे.

हाल ही में उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय द्वारा लोकसभा में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने 30 जनवरी 2020 तक में देश भर में चावल की कुल 333.42 लाख मिट्रिक टन की खरीदी की है. वहीं इस दौरान गेहूं की 341.32 लाख मिट्रिक टन की खरीदी की गई है.

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