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ट्रंप के बाद नेपाल ने भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की पेशकश की

यह पहली बार है जब नेपाल ने भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की पेशकश की है. पाकिस्तान में होने के कारण दक्षेश शिखर सम्मेलन साल 2016 से ही ठप्प पड़ा हुआ है. पिछला दक्षेस सम्मेलन 2014 में काठमांडू में हुआ था जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिस्सा लिया था.

काठमांडू: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कश्मीर मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने का न्यौता देने के कुछ दिन बाद ही शनिवार को नेपाल ने अपने दोनों पड़ोसी देशों के बीच मध्यस्थता का प्रस्ताव रखा.

नेपाल यह कहते हुए भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की भूमिका निभाने की पेशकश की कि अपने मुद्दों को सुलझाने के वास्ते दोनों देशों के लिए वार्ता करना अहम है.

नेपाल सरकार के एक सूत्र ने यहां कहा, ‘वार्ता किसी भी समस्या को सुलझाने के लिए सबसे अच्छा तरीका है. मतभेद हो सकते हैं लेकिन उन्हें बातचीत के माध्यम से सुलझाया जा सकता है. यदि जरूरी हो तो हम मध्यस्थ की भूमिका भी निभा सकते हैं.’

सूत्र ने कहा कि मुद्दों को सुलझाने के लिए सबसे अच्छा तरीका दोनों देशों के बीच बेहतर संवाद कायम करना होगा. उसने कहा, ‘ हमारी भूमिका हो सकती है लेकिन (दोनों पक्षों के लिए) सीधा संवाद विकसित करना बेहतर होगा.’

सूत्र ने कहा, ‘जब हम साथ आएंगे, बैठेंगे और अपने विचार साझा करेंगे तब चीजें सुलझेंगी. हर स्थिति में हमें एक साथ बैठना होगा और समस्या को सुलझाना होगा, अन्यथा चीजें बिगड़ सकती हैं.’

दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (दक्षेस) शिखर सम्मेलन को लेकर वर्तमान अनिश्चितता की स्थिति पर चिंता प्रकट करते हुए सूत्र ने कहा कि इस संगठन में प्राण फूंकने की जरूरत है और गलतफहमी दूर की जानी चाहिए.

सूत्र ने कहा, ‘दक्षेस मृतप्राय नहीं है. यह जिंदा है. बस एक बात है कि हमारी बैठक नहीं हुई है. आशा है कि हम इसे पुन: जीवंत कर सकते हैं.’

यह पहली बार है जब नेपाल ने भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की पेशकश की है. दक्षेश शिखर सम्मेलन साल 2016 से ही ठप्प पड़ा हुआ है. पिछला दक्षेस सम्मेलन 2014 में काठमांडू में हुआ था जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिस्सा लिया था.

दक्षेश वार्षिक शिखर सम्मेलन में 2015 में नेपाल से सार्क की कुर्सी संभालने के लिए पाकिस्तान का समय निर्धारित किया गया था, लेकिन सीमा पार आतंकवाद के लिए पाकिस्तान के समर्थन को जिम्मेदार ठहराते हुए भारत, बांग्लादेश और अफगानिस्तान इससे पीछे हट गए थे.

बता दें कि, दावोस में हो रहे विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) के सत्र से इतर बीते मंगलवार को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ निजी बैठक से पहले ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि अमेरिका कश्मीर के मुद्दे को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच घटनाक्रम पर ‘करीबी नजर’ रख रहा है

वहीं, मध्यस्थता की पेशकश करते हुए उन्होंने कहा था कि अगर हम मदद कर सकते हैं, तो हम निश्चित तौर पर करना चाहेंगे.

ट्रंप इससे पहले भी मध्यस्थता की पेशकश कर चुके हैं. पिछले साल अगस्त में डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ व्हाइट हाउस में बैठक के दौरान कश्मीर मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के बीच ‘मध्यस्थ’ बनने की पेशकश की थी. हालांकि भारत ने सीधे तौर पर ट्रंप की इस पेशकश को खारिज कर दिया था. भारत ने इसे द्विपक्षीय मामला बताया था.

इसके बाद पिछले साल अगस्त में ही फ्रांस में जी 7 सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात से पहले डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि वह मोदी के समक्ष सप्ताहांत में कश्मीर में मध्यस्थता का मुद्दा उठायेंगे. अमेरिका ने पीएम नरेंद्र मोदी से कश्मीर में तनाव कम करने के लिये कदम उठाने का अनुरोध किया था.

भारत ने जम्मू कश्मीर को अपना अभिन्न हिस्सा बताते हुए अमेरिका या संयुक्त राष्ट्र सहित किसी भी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की बात को लगातार सिरे से खारिज किया है. उसका कहना है कि यह पाकिस्तान और उसका द्विपक्षीय मामला है. वहीं पाकिस्तान लगातार तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की मांग करता रहा है.

ट्रंप के हालिया बयान के बाद विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने संवाददाताओं से कहा था, ‘कश्मीर मामले पर हमारा रूख स्पष्ट और स्थिर है . कश्मीर मामले पर किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं है.’ और अगर कोई द्विपक्षीय मामला आता है तब दोनों देशों को द्विपक्षीय ढंग से सुलझाया जाना चाहिए जो शिमला समझौता और लाहौर घोषणापत्र की तहत हो.

पिछले साल अगस्त में जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ गया था. इस निर्णय के बाद पाकिस्तान ने भारत के साथ राजनयिक संबंध कम कर दिए थे और भारतीय राजनयिक को वापस भेज दिया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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