भारत का नव निर्माण

अखंड भारत नवनिर्माण के लिए एक आत्मचिंतन / Photo - Pixabay

जैसा की आप लोगो को पता ही है, दुनिया में ऐसे बहुत से आविष्कार है, जो की हमारे साधु संतो के द्वारा हज़ारो साल पहले किये गए थे, और जिनका हमारे पास का कोई प्रमाण नहीं है, उन्हें आज भी दुनिया अपना बनाने या मनवाने में लगी है| और जिन्हे वो सार्थक स्वरुप देने में असफल रही है| उसे हमारी कोरी कल्पना बता कर झूठा साबित कर देती है| 

कोई भी वास्तु जो आज हमे दिखाई दे रही है या जिसका हम इस्तेमाल कर रहे है वो कभी न कभी वास्तविक रूप में नहीं थी| पर उसे हमारी कल्पना, विश्वास, अथक प्रयास, लगन, मेहनत और दूरदर्शी सोच ने साकार स्वरुप दिया है| हमारा समाज जिसने अपने देश को सोने की चिड़िया के रूप में स्थापित किया था वही समाज, वही हम लोग, आज मूवीज देख देख कर अपनी कल्पना शक्ति खो बैठे हैं|

हम अब वही वस्तु या दृश्य का समावेश कर पा रहे है जिन्हे हमने मूवीज में देखा या सुना है, और उससे भी गलत बात है की हम इन्हे सच मानकर अपने जीवन में अहम स्थान दे देते हैं| चाहे वो मूवीज का कोई संवाद हो या कोई पात्र ही क्यों न हो, कल्पना शक्ति को हम न ही समझ सकते हैं और न ही समझा सकते हैं| जब तक की हम इसमें डूबना न सीख जाये| क्योंकि इसकी तीव्रता और वास्तविकता गहराई तक सोचने तक ही नहीं होती बल्कि उसे सही स्वरुप प्रदान करने तक में होती हैं|

आपने बॉलीवुड फिल्म खलनायक के बारे में सुना या देखा जरूर होगा| आज भी इस मूवी का पात्र हमारे युवा वर्ग को प्रभावित करता हैं, और कुछ युवा इसे अपना आदर्श भी मानते हैं| अब ये हम सब पर निर्भर करता हैं की हम अपनी गलत सोच की आदतों से क्या नवीनता को पा सकते हैं, और क्या इससे हम लोग नए भारत का निर्माण कर सकते हैं| इस पर हमारे युवा वर्ग की भविष्य को लेकर चिंता उसे नवपरिवर्तन करने से कोसो दूर ले जा रही हैं| इसीलिए यहां पर हमे चिंता करने की बजाए चिंतन करने की आवशयकता हैं|

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यह लेख दीपक जोशी (विचारक) जानकीपुरम लखनऊ द्वारा लिखा गया है|

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