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बिजनौर कोर्ट में पुलिस साबित नहीं कर पाई कि CAA प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर गोली चलाई

उत्तर प्रदेश का शहर बिजनौर. यहां दिसंबर, 2019 में नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए थे. यूपी पुलिस ने तक़रीबन 100 लोगों पर अलग-अलग FIR की थी. नजीबाबाद पुलिस स्टेशन में दो लोगों- शफीक़ और इमरान के ख़िलाफ़ दंगा भड़काने और हत्या के प्रयास का मुक़दमा पुलिस ने दर्ज किया था. अब इन दोनों को बिजनौर की सेशन कोर्ट ने ज़मानत दे दी है.

The Indian Express की ख़बर के मुताबिक कोर्ट ने दोनों को ज़मानत देते हुए कहा कि पुलिस इस बात के सबूत नहीं दे पाई कि इन दोनों ने पुलिस पर गोली चलाई. साथ ही कोर्ट ने ये भी कहा कि पुलिस के इस दावे का भी कोई आधार नहीं है कि पुलिस पर गोली चलाई गई. गोली लगने का कोई निशान नहीं पाया गया. साथ ही उत्तर प्रदेश पुलिस ये भी साबित करने में नाकाम रही कि जो हथियार उसने कोर्ट में पेश किए थे, वो इन्हीं दोनों के पास से बरामद किए गए थे.

एडिशनल सेशन जज संजीव पाण्डेय ने ज़मानत देते हुए कहा. ‘हालात देखते हुए आरोपियों को ज़मानत मिलनी चाहिए.’

# क्या हुआ था

उत्तर प्रदेश पुलिस ने 100 से ज़्यादा लोगों पर हिंसा फैलाने को लेकर FIR दर्ज की थी. पुलिस का कहना था कि बिजनौर के नहतौर, नजीबाबाद और नगीना इलाके में हिंसा हुई थी. इस हिंसा में 20 साल के एक लड़के मोहम्मद सुलेमान की गोली लगने से मौत हो गई थी. उत्तर प्रदेश पुलिस ने माना है कि गोली कॉन्स्टेबल मोहित कुमार ने ‘सेल्फ़ डिफ़ेंस’, माने आत्मरक्षा में चलाई. सुलेमान के परिवार ने छह पुलिसवालों के ख़िलाफ़ FIR दर्ज कराई थी.

# पुलिस ने क्या कहा

जिन दो लोगों को सेशन कोर्ट ने ज़मानत दी है, उन पर हुई FIR में पुलिस ने कहा है कि हमें जानकारी मिली कि तक़रीबन 100 से 150 लोगों ने जलालाबाद से नेशनल हाइवे 74 पर जाम लगाया है. भीड़ CAA और NRC का विरोध कर रही थी. इस भीड़ को शफीक अहमद और इमरान लीड कर रहे थे. पुलिस ने भीड़ हटाने की कोशिश की, लेकिन भीड़ ने हिंसा की. इमरान को वहीं से गिरफ्तार किया गया. जबकि दूसरा आरोपी वहां से भाग निकला था.

# क्या कहा कोर्ट ने

शफीक और इमरान को ज़मानत देते हुए कोर्ट ने कहा कि पुलिस इस बात के सबूत नहीं दे पाई कि गिरफ़्तार किए हुए शख्स ने दुकानों और घरों में आग लगाई, या पुलिस पर गोली चलाई. पुलिस पर गोली चलाने के आरोप में गिरफ़्तार इन दोनों के पास मौक़े पर कोई हथियार बरामद नहीं हुआ. पुलिस के किसी जवान को गोली से ज़ख्म हुआ हो, ये भी साबित नहीं हुआ, जबकि जो चोटें दिखाई गई थीं, उनकी वजह पत्थरबाजी थी. पुलिस को कोई गंभीर चोट भी नहीं लगी. ऐसे में आरोपियों की ज़मानत के पर्याप्त आधार हैं.

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