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सीमा वर्मा, बेटे को पालने के लिए दूसरों के घरों में काम किया, आज रनर बन लाखों कमा रही हैं

साल 2012. मुंबई से 62 किलोमीटर दूर एक सिटी वसई विरार. 30 साल की एक औरत ने मैरेथॉन में हिस्सा लिया. ऐसा दौड़ीं कि सब देखते रह गए. रुकीं तब, जब जीत गईं. ये मैरेथॉन इनकी जिंदगी की पहली दौड़ थी. तब से अब तक इन्होंने कई रेस में हिस्सा लिया और कई में जीत हासिल की. नाम है- सीमा वर्मा. काम है बिना रुके दौड़ना.

कौन हैं सीमा?

मैरेथॉन रनर हैं. कराटे में ब्लैक बेल्ट ले चुकी हैं. तलाकशुदा सिंगल मदर हैं. 19 साल का एक बेटा है, उसी को पालने और पढ़ाने के लिए दौड़ना शुरू किया. दौड़ते हुए आठ साल हो चुके हैं. महाराष्ट्र के नाला सोपारा टाउन में रहती हैं. 38 साल की हैं.

कभी दूसरों के घरों में काम करती थीं

दौड़ते हुए लाखों रुपए कमा चुकी सीमा की कहानी तब शुरू हुई, जब वो 17 साल की थीं. TOI की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सीमा जब आठ साल की थीं, तब उनका परिवार कोलकाता से मुंबई आ गया था. जब वो 17 की हुईं, तब परिवार वालों ने उनकी शादी करा दी. एक साल बाद एक बेटा हो गया. पति को शराब की लत थी. हमेशा नशे में सीमा को परेशान करता था. शादी ज्यादा नहीं चल सकी. चार साल बाद ही सीमा अपने पति से अलग हो गईं. तलाक ले लिया. तब वो 22 साल की थीं.

अब खुद को और बेटे को पालने की जिम्मेदारी सीमा को अकेले उठानी थी. उन्होंने दूसरों के घरों में डोमेस्किट हेल्प के तौर पर काम करना शुरू कर दिया. बच्चे को अच्छी पढ़ाई मिले, इसलिए उसे हॉस्टल में डाल दिया.

सीमा को कराटे में हमेशा से दिलचस्पी थी. अपने काम से समय निकालकर उन्होंने कराटे क्लास जॉइन की. लाइफ हो गई एकदम चकरघिन्नी. सुबह 6:30 बजे उठतीं. कराटे क्लास जातीं. नौ बजे लौटतीं. अपने लिए खाना बनातीं. फिर काम पर निकल जातीं.

‘द हिंदू’ को दिए एक इंटरव्यू में सीमा कहती हैं,

‘मैं महीने के करीब 5000 रुपए कमा रही थी. इनमें से 2500 रुपए बेटे की हॉस्टल फीस के लिए देने पड़ते थे. पैसे कम पड़ जाते थे. इसलिए एक्स्ट्रा कमाई के लिए मैं रात में कुरियर देने का काम भी करती थी. हर डिलीवरी में मुझे 60 रुपए मिलते थे.’

फिर कैसे बदली लाइफ?

अब सीमा को कराटे के साथ-साथ रनिंग में भी दिलचस्पी थी. ये बात वो लोग जानते थे, जिनके घरों में सीमा काम करती थीं. इन्हीं में से एक औरत ने सीमा की मदद की. उनसे कहा कि वो रनिंग क्यों नहीं करतीं? ये बात थी साल 2012 की. उस औरत की मदद से सीमा ने दौड़ना शुरू किया. मैरेथॉन में हिस्सा लिया और जीता. वो कहती हैं,

‘2012 की मेरी पहली रेस के बाद रनिंग मेरे बेटे के बाद मेरा दूसरा प्यार बन गई. ये सबकुछ तब शुरू हुआ, जब एक इम्प्लॉयर (जिनके घर काम करती थीं) ने मुझे मैरेथॉन में भाग लेने का सुझाव दिया, जिससे मैं ज्यादा पैसे जीत सकती थी. अपनी पहली ही रेस में मैं फर्स्ट आई थी, वो भी तब, जब अपने दूसरे प्रतिभागियों की तरह मेरे पास जरूरी ट्रेनिंग नहीं थी.’

पहली रेस के बाद सीमा रुकीं नहीं. पुणे मैरेथॉन में हिस्सा लिया और फिर कई और रेस दौड़ीं. अभी भी पार्टिसिपेट करती रहती हैं. वो कहती हैं, ‘मुझे बार-बार अपने पैरों को चूमने का मन करता है. मैं जब भी निराश महसूस करती हूं, दौड़ती हूं. ये मुझे दूसरी दुनिया में लेकर जाता है.’

डॉक्यूमेंट्री भी बन चुकी है.

ये सच है. नेटफ्लिक्स पर सीमा पर बनी डॉक्यूमेंट्री मौजूद है. नाम है ‘लिमिटलेस’. इसमें आठ महिला रनर की कहानी दिखाई गई है. इनमें से एक सीमा भी हैं.

आज सीमा खुश हैं. तमाम संघर्ष झेलने के बाद वो आज अच्छी लाइफ जी रही हैं. अपने बेटे को पढ़ा रही हैं. बीती बातों को भुलाकर.

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