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मोबाइल लाइब्रेरी से 30 गाँवों, 16 चाय बागानों के बच्चों को पढ़ाता एक दंपति

अनिर्बान नंदी और पौलमी चाकी नंदी/ फोटो : BISWARUP BASAK
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अनिर्बान नंदी और पौलमी चाकी नंदी/ फोटो : BISWARUP BASAK

उत्तर बंगाल के दार्जिलिंग जिले में सिलीगुड़ी से सटे चाय बागान इलाकों में मजदूरों के बच्चों को लाल रंग की एक कार का बेसब्री से इंतज़ार रहता है. दरअसल उस कार से आने वाले पति-पत्नी उनको पढ़ने के लिए मुफ्त किताबें तो देते ही हैं, महज दस रुपए में महीने भर ट्यूशन भी पढ़ाते हैं.

यह दंपति हैं अनिर्बान नंदी और उनकी पत्नी पौलमी चाकी नंदी. अनिर्बान भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), खड़गपुर में सीनियर रिसर्च फेलो हैं और पौलमी सोशल साइंस और इकॉनामी में रिसर्च एसोसिएट हैं लेकिन फ़िलहाल कॉलेज बंद होने की वजह से यह दोनों अपने घर पर रह रहे हैं.

लॉकडाउन में दोनों मिलकर चाय बगान मजदूरों की ज़िंदगी संवारने की कोशिशों में जुटे हैं. दरअसल, इलाक़े के चाय बागान मज़दूरों के ग़रीब बच्चों की पढ़ाई लॉकडाउन में पूरी तरह ठप्प हो गई थी. इन दोनों ने अपनी एक मोबाइल लाइब्रेरी शुरू की है और अपनी गाड़ी में किताबें भर कर उन इलाकों के बच्चों तक पहुँचा रहे हैं.

उनका कहना है कि ग़रीब बच्चे स्मार्टफोन, लैपटाप और इंटरनेट कनेक्शन नहीं होने की वजह से ऑनलाइन पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं. इसलिए उन्होंने यह लाइब्रेरी शुरू की है. इस लाइब्रेरी के लिए नंदी दंपति ने अपने मित्रों और परिजनों से मांग कर छह हज़ार से ज़्यादा किताबें जुटाई हैं. यह दंपति ज़रूरतमंद बच्चों को तीन महीने के लिए किताबें उधार देता है.

इन बच्चों को अंग्रेजी कंप्यूटर विज्ञान, अर्थशास्त्र, भूगोल और राजनीति विज्ञान पढ़ाने के लिए दंपति ने 'दस-टाकार ट्यूशन' यानी दस रुपये में ट्यूशन योजना भी शुरू की है. इस दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ख़याल रखा जाता है.

कैसे आया ये आईडिया



इस दंपति ने मोबाइल लाइब्रेरी तो कुछ समय पहले शुरू की थी लेकिन इसकी उपयोगिता कोरोना और उसकी वजह से होने वाले लॉकडाउन में कई गुना बढ़ गई है.

चाय बागान इलाकों के आदिवासी बच्चों में पढ़ाई के प्रति ललक देख कर इस दंपति ने दस रुपये में उनको ट्यूशन पढ़ाना भी शुरू किया. उनकी इस योजना को कई लोगों ने आर्थिक सहायता भी मुहैया कराई है. लाइब्रेरी में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए भी ज़रूरी किताबें हैं.

लेकिन आखिर यह विचार मन में आया कैसे?

बीबीसी से बातचीत में अनिर्बान कहते हैं, "मैं भी इसी ग्रामीण इलाके में रहा हूं. मुझे बचपन में पढ़ाई के दौरान काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था. स्कूल का रास्ता काफी लंबा था. तब महानंदा नदी पर पुल नहीं बना था. इसके अलावा बढ़िया ट्यूशन नहीं मिला. इसलिए मैंने सोचा कि जो मुझे नहीं मिला उससे इन बागानों के बच्चे वंचित क्यों रहें."

ग्रामीण इलाकों की अर्थव्यवस्था पर अपने शोध के दौरान उनको इलाक़े की ज़मीनी हक़ीक़त का पता चला था.

इस दौरान उनको महसूस हुआ कि इलाक़े में स्कूली बच्चों के लिए बहुत कुछ करना बाकी है. अनिर्बान को लगा कि थोड़ी-सी सहायता और प्रोत्साहन मिलने पर कई बच्चे जीवन में बहुत आगे जा सकते हैं.

आदिवासी लड़कियों में नई ललक



वे बताते हैं, "पहले मैंने इन बच्चों को मुफ्त किताबें देने का फ़ैसला किया. लेकिन फिर सोचा कि सीमित संसाधनों में कितने लोगों को यह सब दे सकूंगा. उसके बाद ही मोबाइल लाइब्रेरी की योजना बनी. इसके तहत बच्चों को तीन-तीन महीने के लिए किताबें उधार दी जाती हैं. वह भी बिल्कुल मुफ्त."

दस रूपये में ट्यूशन के बारे में अनिर्बान कहते हैं, "हमें लगा कि मुफ्त में पढ़ाने की बात कहने पर बच्चे शायद नहीं आएंगे. इसलिए दस रुपये तय किया. माता-पिता अपने दस रुपये के लालच में उनको नियमित रूप से ट्यूशन पढ़ने भेजेंगे. अब यह दंपति अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग दिन जाकर बच्चों को पढ़ाता है."

एक अन्य सवाल पर अनिर्बान बताते हैं, "उन्होंने बिना किसी ठोस योजना के यह सब शुरू किया था. नियमित ट्यूशन के बाद इन बच्चों की पढ़ाई-लिखाई बेहतर हुई है. इससे मानसिक संतोष मिलता है."


फ़िलहाल यह दंपति अब तक 30 गाँवों और 16 चाय बागानों तक पहुंचा है. उनकी लाइब्रेरी के करीब 16 सौ सदस्य हैं.

दिलचस्प बात यह है कि उनमें से 80 फ़ीसद लड़कियां हैं. दस टाकार ट्यूशन योजना के तहत फिलहाल सिलीगुड़ी से सटे लोहासिंग चाय बागान के 80 बच्चे पढ़ रहे हैं. इस दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ध्यान रखा जाता है.

पौलमी बताती हैं, "इस योजना के ज़रिए चाय बागान इलाके की आदिवासी लड़कियों में शिक्षा के प्रति एक नई ललक पैदा हुई है. अब बागानों की ज़्यादातर लड़कियां पढ़ने के लिए आगे आ रही हैं. पहले खासकर लड़कियों की पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया जाता था. यही हमारे लिए सबसे संतोष की बात है."

बच्चों में उत्साह



मेरी व्यू चाय बागान की रानीमा अपने पांच महीने के बच्चे के साथ पढ़ने आती है.

उन्होंने कहा, "शादी से पहले अभावों की वजह से चौथी कक्षा के बाद पढ़ाई नहीं कर सकी थी. अब छूटी हुई पढ़ाई दोबारा शुरू करने का मौका मिल गया है."

गंगाराम चाय बागान की मौसमी लाकड़ा भी पढ़ाई दोबारा शुरू होने पर खुश है.

वह बताती हैं, "ऑनलाइन पढ़ाई में कई दिक्कतें हैं. हमारे पास न तो स्मार्टफोन है और न ही इंटरनेट कनेक्शन. लेकिन नंदी अंकल की सहायता से मुझे किताबें भी मिल गई हैं और दस रुपये में ट्यूशन भी."

गंगाराम चाय बागान भी ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चों की देख-रेख करने वाली आइलिन मिंज कहती हैं, "कोरोना शुरू होने के बाद इलाक़े का इकलौता स्कूल बंद पड़ा है. ऐसे में यह कार्यक्रम बागान इलाके के आदिवासी बच्चों के लिए वरदान साबित हो रहा है. इससे तमाम छात्र और खासकर लड़कियों को अपनी छूटी हुई पढ़ाई दोबारा शुरू करने का मौक़ा मिल गया है."

लोअर बागडोगरा की पंचायत प्रधान विभा विश्वकर्मा कहती हैं, "इस कार्यक्रम से इलाक़े के आदिवासी बच्चों में काफी उत्साह है. ख़ासकर मोबाइल लाइब्रेरी से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले बच्चों को भी मुफ्त किताबें और मार्गदर्शन मिल रहा है. इससे इन मज़दूरों के बच्चे जीवन में कुछ बन सकेंगे."





Basti Khabar

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Basti Khabar Pvt. Ltd. Desk


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