बीजेपी के चुनाव हारने की तीन वजहें, दूसरी तो बहुत ज़रूरी है

भाजपा दिल्ली चुनाव हार गयी है. आम आदमी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिले हैं. टीवी की भाषा में प्रचंड बहुमत भी लिख सकते हैं. चुनाव आपने देखा. चुनाव प्रचार आपने देखा. आपने सब देखा. हम फिर भी बताने आये हैं कि भाजपा किन तीन वजहों से दिल्ली चुनाव में हार गयी.

1. केजरीवाल नहीं तो कौन

लोकसभा चुनाव 2019. नरेंद्र मोदी फिर से अपना लक आजमा रहे थे. चुनाव प्रचार हो रहे थे. भाजपा समर्थकों के पास विरोधियों के लिए एक ही सवाल था. मोदी नहीं तो कौन. TIMO फैक्टर आया.मतलबThere is Modi only. दिल्ली के चुनाव में भी कमोबेश ऐसा ही हुआ. दिल्ली के चुनाव में जब बात शुरू हुई प्रत्याशियों की. तो आम आदमी पार्टी के पास एक चेहरा था. अरविन्द केजरीवाल.

लेकिन उनके बरअक्स भाजपा या कांग्रेस को देखें. चेहरे गायब. भाजपा ने प्रचार नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बूते किया. स्थानीय स्तर पर मनोज तिवारी जुटे रहे. लेकिन मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इस पर भाजपा के वोटर को शायद ही कोई आश्वस्ति थी. ज़ाहिर है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह मुख्यमंत्री नहीं बन सकते थे. लेकिन स्थानीय स्तर पर भसड़ ज्यादा थी. मनोज तिवारी ही नहीं. विजय गोयल, गौतम गंभीर. हरदीप पुरी, परवेश वर्मा, रमेश बिधूड़ी और हर्षवर्धन. कई चेहरे थे. और एक्सिस माय इंडिया का सर्वे था. कहता है कि लोग चुनाव में आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री रह चुके अरविन्द केजरीवाल के नाम पर ही सहमत थे. इसके अलावा विपक्षियों के नामों पर बंटे हुए थे.

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2. लोकल मुद्दे बनाम नारेबाज़ी

चुनाव प्रचार शुरू हुए. अखबार दैनिक भास्कर ने एक रिपोर्ट छापी. अरविन्द केजरीवाल अपने भाषणों में स्कूल, शिक्षा, अस्पताल, स्वास्थ्य, पानी जैसे शब्द ज्यादा इस्तेमाल में ला रहे थे. वहीं अमित शाह और मनोज तिवारी अपने भाषणों में पाकिस्तान, इमरान खान, आतंकवाद, देशद्रोह, कश्मीर जैसे शब्द बारहा इस्तेमाल कर रहे थे.

भाजपा के प्रचारक अनुराग ठाकुर “देश के गद्दारों को, गोली मारो *लों को” जैसा नारा लगा रहे थे. वहीं दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के बेटे परवेश वर्मा ने शाहीन बाग़ में CAA का विरोध कर रहे लोगों के बारे में कह दिया कि ये लोग घरों में घुसकर बहन-बेटियों का रेप कर देंगे. जिस समय ये सब हो रहा था, इस समय दिल्ली सरकार की शिक्षा, पानी, स्वास्थ्य, ट्रांसपोर्ट जैसी सेवाएं मुफ्त में लोगों को मिल रही थीं. बगैर किसी रोकटोक और भेदभाव के. केजरीवाल ने मुफ्त में कई सारी चीजें देने का वादा किया था. और चुनाव में वादा दुहरा दिया.

3. और भाजपा का ब्रांडिंगवाला मामला फिर गया

तीसरा कारण. भाजपा का समर्थन समर्थन करने वाला धड़ा अरविंद केजरीवाल या आम आदमी पार्टी की कोई पर्टिकुलर ब्रांडिंग नहीं कर पाया. लालू यादव “चाराचोर” हो गए थे. मुलायम सिंह यादव के नाम के आगे “मौलाना” लगाया जाने लगा. अखिलेश यादव “टोंटीचोर” कहे गए. कांग्रेस पर आरोप लगा कि वो मुस्लिमों की वाहवाही बटोरने के पीछे लगी हुई है. अन्ना आन्दोलन के समय से ही कांग्रेस “भ्रष्ट” हो गयी. राहुल गांधी पर “पप्पू” का तमगा लग गया.

इस आलोक में अरविन्द केजरीवाल को देखें. कम से कम अब तक, अरविन्द केजरीवाल, उनकी सरकार और उनके मंत्रियों पर भ्रष्टाचार का कोई बड़ा आरोप नहीं लगा था. साथ ही अरविन्द केजरीवाल किसी वृहद् ट्रोलिंग के शिकार नहीं हुए. एकदफा उनके मफलर का मज़ाक उड़ा था. केजरीवाल की पार्टी ने “मफलर मैन” का हिसाब बना लिया. मतलब छिटपुट छींटाकशी का भी मामला आम आदमी पार्टी ने जमा लिया. और भाजपा को हार का एक और कारण दे दिया.

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