क्या लिखा है ‘कस्तूरबा की रहस्यमयी डायरी’ में?

क्या लिखा है 'कस्तूरबा की रहस्यमयी डायरी' में? - Basti Khabar

नीलिमा डालमिया आधार की नई किताब ‘द सीक्रेट डायरी ऑफ़ कस्तूरबा’ आई है. हिंदी में ये ‘कस्तूरबा की रहस्यमयी डायरी’ के नाम से छपी है. हम प्रकाशक की इजाजत से आपको उसका एक अंश पढ़ा रहे हैं.


हम खेल के साथी बन गए. यह पिछले जन्म का संबंध था; वे मेरे मोहनदास थे और मैं उनकी कस्तूर. मैं अक्सर गांधी परिवार के पोते-पोतियों के साथ मिलने-जुलने उनके घर के खुले आंगन में चली जाती. हम घंटों गेंद खेलते, लकड़ी के लट्टू घुमाते, ज़मीन पर बने घेरों में कंचों के ढेर पर बेढंगेपन से निशाने लगाते, खड़िया के छोटे-छोटे टुकड़ों पर लड़ते, राहदरी के पटियादार फ़र्श पर अमूर्तकला के नमूने बनाते, काल्पनिक नाटक खेलते, एक-दूसरे के बाल और कपड़े पकड़कर खींचते-धकेलते जब तक कि हंसते-हंसते दोहरे नहीं हो जाते थे. ये बहुत ख़ुशगवार मस्ती थी जो दिनभर चलती रहती थी.

लेकिन जैसे ही मैं पांच बरस की हुई, मेरी मां ने मुझ पर बंदिशें लगा दीं. “अच्छी लड़कियां ऐसा नहीं करतीं!”, “तुम लड़कों के साथ नहीं खेल सकतीं, कस्तूर. नहीं, नहीं! मोहनदास के साथ भी नहीं. अब तुम बड़ी हो गई हो.” उनकी आवाज़ हल्की हो जाती.

और इस के बाद पड़ोस में मेरा आना-जाना हमेशा के लिए बंद हो गया. मोहनदास को, जो हमेशा से उत्सुक और बेचैन क़िस्म के थे, मोहल्ले में आराम से घूमने-फिरने की इजाज़त थी अलबत्ता सेविका की गिद्ध दृष्टि के साये में, जबकि मैं समर्पित पत्नी और अच्छी मां बनने के सबक़ पाने की प्रत्याशा में घर में बंद बैठी रहती थी. भेदभाव बहुत दृढ़ता से अपनी जगह था. “अच्छी लड़कियां ऐसा नहीं करतीं!”

राजकोट के घर में, अपने पति की पहली झलक देखने के लिए मैं ख़ुशी से मरी जा रही थी, जिन्हें उस एक फ़ोटो के अलावे मैंने छत्तीस महीनों से नहीं देखा था. मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था. मेरे हाथ कांप रहे थे. मैं अपनी घबराहट पर क़ाबू नहीं रख पा रही थी. मेरे पास यह जानने का कोई तरीक़ा नहीं था कि अब जबकि ‘गोरे लोगों’ के देश में वे ज़िंदगी का स्वाद चख चुके हैं तो इन तीन सालों में मोहनदास कहीं बदल तो नहीं गए हैं और वे मुझसे क्या अपेक्षा रखते हैं. मैं उस अजनबी से फिर से कैसे परिचय बढ़ाऊंगी जिसके लिए मैं इतनी लंबी और नींदरहित रातों से तरस रही हूं?

अपनी पत्नी कस्तूरबा के साथ गांधी जी.
अपनी पत्नी कस्तूरबा के साथ गांधी जी.

उस सुबह सूरज निकलने से पहले मैं गुलाबजल से नहाई और मैंने हल्के गुलाबी रंग की सुंदर सी साड़ी पहनी जिसे मैंने अपनी जेठानी गंगा से मांगा था. मैंने अपने शयनकक्ष की दीवार पर लगे आईने में ख़ुद को देखा और अपने माथे के बीचोबीच एक बड़ी सी लाल बिंदी लगा ली. मांग में सिंदूर की महीन रेखा उकेरी जो भोर की धुंधली रोशनी में चमक रहा था. मैंने बड़े ध्यान से अपने लंबे काले बालों को काढ़ा जो बेक़ाबू घूंघरों में कमर के नीचे तक लटके हुए थे. मैंने उन्हें सुलझाया और अपने सिर पर ढके साड़ी के पल्लू के सिरे को खोंसा. मेरा चेहरा और काजल लगी मेरी बड़ी-बड़ी आंखें दमकने लगी थीं. अपने प्रिय के साथ होने के ख़्याल से ही मेरा दिल बुरी तरह धड़कने लगा था. न जाने कितनी देर बाद हरिलाल के रोने ने मुझे मेरे दिवास्वप्न से बाहर निकाला.

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दिसंबर 1901

सदी का परिवर्तन मेरे लिए ख़ुशियों की सौगात, ख़ासकर राजकोट में मेरी वापसी लेकर आया था. मोहनदास और बच्चों के साथ मैं भारी दिल से दक्षिण अफ़्रीका से चली थी. मगर राजकोट वापस आकर मैं ख़ुश थी और डरबन के अंतिम कुछ दिनों की तकलीफ़देह यादें किसी हद तक धुंधला गई थीं. मित्रों और परिवारजनों ने बहुत उत्साह से हमारी घर वापसी का जश्न मनाया. मगर मोहनदास के मन में शांति नहीं थी. हर वक़्त अलग-थलग और बेचैनी से भरे मोहनदास को राजकोट को हमारे घर में हो रही घटनाओं में कोई दिलचस्पी नहीं थी.

17 दिसंबर को, अपनी दिनचर्या में हमारे ढलने के महज़ तीन दिन बाद ही वे इंडियन नेशनल कांग्रेस के सत्रहवें वार्षिक सम्मेलन में शरीक होने के लिए प्रतिनिधियों के एक समूह के पास बंबई चले गए. उन्हें महसूस हुआ कि पांच वर्ष के लंबे अंतराल के बाद भारतीय नेताओं के साथ अपने संबंध फिर से सुदृढ़ करने और दक्षिण अफ़्रीका में हमारे देशवासियों द्वारा भोगी जा रही यातनाओं को सामने लाने का यह अच्छा मौक़ा होगा.

मोहनदास ने बहुत पैरवी की. कलकत्ता जाते हुए एक पल भी बर्बाद किए बिना वे कांग्रेस पार्टी के दूसरे नेताओं के सामने अपनी बात रखते रहे. मगर उनके उत्साह पर पानी फेर दिया गया; ज़्यादातर नेताओं की राय थी कि भारत की परिस्थितियों को देखना प्राथमिकता है, उसके बाद ही विदेशों में बसे समुदाय की कोई मदद की जा सकती है. और कलकत्ता सत्र बिना किसी सफलता के तुष्टी कारक सुर पर समाप्त हुआ. आसानी से हार मानने को तैयार न होकर मोहनदास कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता गोपाल कृष्ण गोखले के घर पर ही ठहर गए, और उनके साथ रोज़ाना संभ्रांत इंडिया क्लब जाते. वे अनेक प्रभावशाली लोगों से मिलने लगे जिनमें प्रतिष्ठित बंगाली परिवारों के सदस्य और समृद्ध व्यक्ति भी शामिल थे.

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डांडी मार्च के दौरान अपने साथियों और समर्थकों के साथ गांधी जी.
डांडी मार्च के दौरान अपने साथियों और समर्थकों के साथ गांधी जी.

गोखले ने ही उन्हें दुनियाभर में अपने साथी भारतीयों की आज़ादी के लिए काम शुरू करने की सलाह दी. उन्होंने मोहनदास को सलाह दी कि अपने मिशन की शुरुआत पहले देशभर की यात्रा करके करें ताकि वे निर्धनों की स्थिति से परिचित हो सकें.

मोहनदास ने अपने पथ-प्रदर्शक की सलाह पर अमल किया. जल्दी ही वे बर्मा की छोटी सी यात्रा पर गए जहां उन्होंने वहां की महिलाओं के मुक्तस्वभाव को बहुत आकर्षक पाया, मगर पुरुषों की आम निष्क्रियता और देश के पवित्र पगोड़ों में फिरते चूहों के भयंकर दृश्य को देखकर भौचक्के रह गए. कुछ हफ़्ते बाद वे कलकत्ता वापस आए और राजकोट जाने के लिए हफ़्ते भर लंबी ट्रेन यात्रा का तीसरे दर्जे का टिकट ख़रीदा. गुजराती देहाती शैली की धोती और बंडी पहनकर भीड़ भरे हावड़ा स्टेशन से अपना सफ़र शुरू करने के लिए वे ट्रेन में सवार हुए. एक मायने में भारत के उन हिस्सों से होकर यह उनकी पहली रेलवे तीर्थयात्रा होने वाली थी जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखे थे.

आश्चर्यजनक रूप से, मोहनदास के पथ-प्रदर्शक गोपाल कृष्ण गोखले ने इसका स्वागत नहीं किया, क्योंकि उन्होंने अपने युवा शिष्य के लिए कहीं बड़े काम सोच रखे थे. मगर मोहनदास के लिए यह उनकी संयमी जीवनशैली के कहीं ज़्यादा अनुरूप था. तीसरे दर्जे के थ्री टियर डिब्बे में खिड़की के पास की सीट से उनका रूपांतरण शुरू हुआ था, उन वस्तुओं के साथ जो प्रतीकात्मक रूप से ऐसे जीवन का साधन बन गई थीं जो सादगी का पर्याय बन गया था. कपड़े का एक सस्ता झोला जिसमें एक अंगोछा था, बांह में दबा मोटा कंबल और कंधे पर लटकी पानी की बोतल.

1919 के शुरुआती महीनों में, मणि भवन खुशियों और उत्साहपूर्ण गतिविधियों का गहवारा बन गया. मोहनदास लगभग पूरी तरह स्वस्थ हो चुके थे, हरिलाल कलकत्ता लौट गया था और चारों बच्चों को मेरी देखरेख में मणि भवन भेज दिया गया था. उन्होंने एक बार फिर से मेरे घर को अपनी मासूम हंसी से, भर दिया और यह कल्पना करके ही मेरा मन भिंचने लगता था कि इन्होंने कुछ ही समय पहले अपनी मां और एक भाई के दुख को कैसे सहन किया होगा. अब सिर्फ़ चारों में सबसे बड़ी रामी ऐसी दिखाई देती थी जैसे वह पीड़ा उसके चेहरे पर छा गई है. वह बहुत कम बोलती थी और कभी हमेशा चमकने वाली उसकी आंखें अब पथराई सी दिखाई देती थीं.

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उनका दुख मोहनदास से भी छिपा नहीं था. वे दोनों छोटे बच्चों से दुलार करते और बड़ों की देखभाल में पूरी तरह खो जाते थे. मैं देख सकती थी कि अपने पोती-पोतों का साथ उन्हें आनंद देता है. लगता था कि उनके कठोर हृदय में एक झिरी खुल गई है, क्योंकि उन्होंने हरिलाल को एक असाधारण रूप से कोमल चिट्ठी लिखी,

…गोल-मटोल मनु की चमक लगातार और भी कांतिमय होती जा रही है. दोनों लड़के कांति और रसिक हर समय मेरे पलंग के आस पास खेलते रहते हैं. यह दृश्य मुझे तुम्हारे बचपन की याद दिला देता है…

मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया. शायद एक बड़ी त्रासदी की भरपाई के रूप में हमें ढेर सारी ख़ुशी दी जा रही थी जो आख़री बार हमें कब मिली थी, मुझे याद नहीं था. ऐसा लगता था जैसे बच्चों ने अपने दादा को बदल दिया हो! मैंने देखा कि मोहनदास को छह वर्षीय रसिक से हंसी-ठिठोली करने में ख़ास मज़ा आता था. एक शाम उन्होंने उसके लिए एक कविता लिखी जो मुझे पारिवारिक प्यार के अपने बहुप्रतीक्षित सपने का सार लगीः

रसिकलाल हरिलाल मोहनदास करमचंद गांधी
के पास एक बकरी थी
बकरी दूध नहीं देती थी
और गांधी रोता जाता था

इस बेतुकी कविता को सुनकर बच्चे फ़र्श पर लोट पोट होने लगे और हम ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे. मैं हमारे बीच बहल हुए इस रिश्ते पर बेहद ख़ुश थी; और मैं उस ख़ुशी को देख रही थी जो अभी तक बदनसीब रहे गांधी परिवार से लंबे समय तक दूर रहने के बाद आख़िरकार उन्हें मिल रही थी.

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महात्मा गांधी एक अपने इंग्लैंड ट्रिप के दौरान एक बच्चे के साथ.
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ये किताब हिंदी और इंग्लिश दोनों ही भाषाओं में उपलब्ध है. इस किताब को छापा है ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर ने. इससे पहले 2003 में नीलिमा डालमिया आधार ने ‘फादर डियरेस्ट: द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ़ आर. के डालमिया’ लिखी, जो उस साल बेस्टसेलर बुक्स की लिस्ट में शामिल थी. इसके बाद उन्होंने 2007  में ‘मर्चेंट्स ऑफ़ डेथ’ नाम का एक उपन्यास लिखा. और अब ‘द सीक्रेट डायरी ऑफ़ कस्तूरबा’ या ‘कस्तूरबा की रहस्यमयी डायरी’.

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