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जब दिल्ली में शराब बैन हो गई थी और नेहरू को चिट्ठी लिखनी पड़ी

साल था 1952. दिल्ली में पहली बार विधानसभा चुनाव हुए थे. गुरुमुख निहाल सिंह ने गृहमंत्री गोविंद वल्लभ पंत के कहने पर चुनाव लड़ा था. राजनीति में उन्हें तीन साल ही हुए थे. निहाल सिंह ने चुनाव जीता. दिल्ली विधानसभा के स्पीकर बन गए. पंत को लगता था कि कई कॉलेजों में प्रिंसिपल रहा ये व्यक्ति न सिर्फ बोलने में अच्छा होगा, बल्कि पार्टी के उद्दंड नेताओं को ठिकाने से रखेगा.

चौधरी ब्रह्म प्रकाश दिल्ली के पहले सीएम बनाए गए थे. वे थोड़े अक्खड़ स्वभाव के थे. राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त चीफ कमिश्नर और सीएम में पटरी मेल नहीं खाती थी. कांग्रेस के लिए चौधरी ब्रह्मप्रकाश को झेलना मुश्किल होता जा रहा था. आखिरकार 12 फरवरी, 1955 को चौधरी साहब से इस्तीफा ले लिया गया.

13 फरवरी, 1955 को निहाल सिंह ने दिल्ली के मुख्यमंत्री का पदभार संभाल लिया. सीएम बनते ही उन्होंने पूरी दिल्ली में शराब बंद करवा दी. हंगामा मच गया. बात इतनी बढ़ी कि प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को चिट्ठी लिखनी पड़ी. नेहरू ने 26 जुलाई, 1956 को लिखा,

“हमारी हेल्थ मिनिस्टर राजकुमारी अमृत कौर ने दिल्ली में शराबबंदी की नीति के बारे में बताया. मैं इस विषय में ज्यादा जानकारी नहीं रखता. हम शराबबंदी के पक्ष में हैं, लेकिन निषेध के साथ हमेशा एक खतरा बना रहता है. इससे अवैध शराब निर्माण और तस्करी बढ़ सकती है. इस तरह का उपचार बीमारी से ज्यादा खतरनाक है.

हेल्थ मिनिस्टर का कहना है कि कहीं-कहीं तो अवैध शराब का धंधा शुरू भी हो गया है. मुझे उम्मीद है कि आपकी सरकार इस पहलू को ध्यान में जरूर रखेगी.”

नेहरू के तर्क-वितर्क के बाद भी निहाल सिंह ने बैन नहीं हटाया. कांग्रेस पार्टी के अंदर भी इस पर खूब बहस चली. लेकिन बैन के पक्ष में खड़ी कांग्रेस लॉबी भारी पड़ गई. इस लॉबी के मुखिया थे दिग्गज कांग्रेसी नेता मोरारजी देसाई. मोरारजी सात्विक प्रवृति के नेता थे. और राजनीति में भी शुद्धता का बखूबी पालन करते थे.

ये खबर भी खूब चली कि गुरुमुख निहाल सिंह ने अपने बेटे की शराब की लत से परेशान होकर पूरी दिल्ली में शराब बंद करवा दी थी.

1 नवंबर, 1956 को दिल्ली को यूनियन टेरिटरी बना दिया गया. विधानसभा भंग कर दी गई. अगले 37 सालों तक दिल्ली में मुख्यमंत्री का पद खत्म कर दिया गया. 18 नवंबर को गुरुमुख निहाल सिंह को राजस्थान का गवर्नर बनाया गया.

*ये किस्सा गुरुमुख निहाल सिंह के बेटे और दिग्गज संपादक सुरेंद्र निहाल सिंह ने अपनी किताब ‘Ink in my Veins’ में लिखा है.

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