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जहां पीएम मोदी ने गोलियां चलाईं, वो वर्चुअल फायरिंग रेंज क्या है?

जहां पीएम मोदी ने गोलियां चलाईं, वो वर्चुअल फायरिंग रेंज क्या है?
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लखनऊ में शुरू हुए डिफेंस एक्सपो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आधुनिकतम हथियारों का जायजा लिया. पीएम मोदी ने हथियारों को देखा और वर्चुअल शूटिंग रेंज में निशाना भी लगाया. एक्सपो में मौजूद एक्सपर्ट्स ने पीएम मोदी को हथियारों के बारे में जानकारी दी. बाक़ी जानकारी तो ठीक, लेकिन लोग पूछ रहे हैं कि जहां मोदी ने जहां फ़ायरिंग की, वो वर्चुअल शूटिंग रेंज है क्या?

सवाल ये भी है कि क्या पीएम मोदी ने वाक़ई गोलियां चलाईं? जवाब है ‘नहीं’. कैसे? इसे समझने के लिए वर्चुअल शूटिंग रेंज को समझना पड़ेगा.

# वर्चुअल शूटिंग रेंज है क्या?

वर्चुअल, माने आभासी. जो चीज़ होती नहीं है, लेकिन आभास होता है कि वो है. पीएम मोदी जिस शूटिंग रेंज में फ़ायरिंग करते दिखाई दे रहे हैं, वो आभासी है. उसमें न तो कोई गोली चली, न ही कोई टारगेट हिट होता है. क्योंकि रियल शूटिंग रेंज में तो असली गोली भी चलती है और टारगेट भी हिट होता है. तो फिर अब ये समझते हैं कि वर्चुअल शूटिंग रेंज में बिना गोली चलाए भी कैसे शूटिंग की प्रैक्टिस की जाती है.

वर्चुअल शूटिंग रेंज में स्क्रीन होती है. इस स्क्रीन पर टारगेट दिखाई देते हैं. ये टारगेट कुछ भी हो सकते हैं. ये कोई निशान हो सकता है या इंसान भी हो सकता है. लेकिन ये असली नहीं होंगे. आभासी होंगे. स्क्रीन पर सब कुछ चलेगा. अब सवाल ये है कि स्क्रीन पर चल रहे टारगेट को आप हिट कैसे करेंगे? इसके लिए समझना होगा इन शूटिंग रेंज में इस्तेमाल होने वाली बंदूकों को.

गोली चलाने के लिए आवाज़ का सबसे बड़ा रोल होता है
गोली चलाने के लिए आवाज़ का सबसे बड़ा रोल होता है

# किस तरह की बंदूकें होती हैं?

दिखने में बिल्कुल असली बंदूकों की तरह ही होती हैं. पिस्टल, रिवॉल्वर और असॉल्ट रायफ़ल. लेकिन इसमें गोलियां नहीं होतीं. हां, गोलियां वैसे ही चलेंगी, जैसी असली बंदूक में होती हैं. आवाज़ होगी. कारतूस नहीं होंगे. न तो आपकी बंदूक से ब्लैंक कारतूस बाहर निकलेंगे, न ही आग और धुआं उठेगा.

तो अब सवाल उठता है कि जब बंदूक से कोई गोली निकलेगी ही नहीं, तो वर्चुअल ही सही, लेकिन टारगेट को हिट कैसे करेगी? इसका जवाब है आवाज़ और लाइट. कैसे? ये अब समझते हैं.

आवाज़ को मापने के लिए इकाई होती है डेसिबल. जैसे हम गुड़ किलो में तौलते हैं, वैसे ही आवाज़ मापी जाती है डेसिबल में. और वर्चुअल शूटिंग रेंज में स्क्रीन पर जहां टारगेट दिखाई देते हैं, उनके पीछे आवाज़ को मापने की मशीन लगी होती है.

अब असली बंदूक का गणित ये होता है कि छोटी बंदूक से चलने वाली गोली की आवाज़ कम होती है. बड़ी बंदूक से छूटने वाली गोली ज़्यादा आवाज़ करती है. पिस्टल के मुक़ाबले AK 47 की गोली ज़्यादा तेज़ आवाज़ करती है. तो जब आप वर्चुअल शूटिंग रेंज में प्रैक्टिस करते हैं, तब आपकी बंदूक के हिसाब से आवाज़ सेट की जाती है. जैसे 134 डेसिबल की आवाज़ का मतलब कि रायफ़ल से गोली निकली. 159 डेसिबल आवाज़ AR 15 रायफ़ल की होती है. इस हिसाब से होती है सेटिंग बंदूक में गोली की.

अब सवाल उठता है कि सामने की स्क्रीन पर टारगेट तक आपकी वर्चुअल गोली जाती कैसे है? इसके लिए इस्तेमाल होती है इन्फ्रा रेड लाइट. इस लाइट को आप जहां पॉइंट करेंगे, वहां टारगेट हिट होगा. वर्चुअल शूटिंग रेंज विज्ञान की वो करामात है, जहां आप बिना गोलियां बर्बाद किए निशाना लगा सकते हैं.

सारा खेल है आवाज़ और लाइट का
सारा खेल है आवाज़ और लाइट का

# और कहां-कहां इस्तेमाल होती है ये तकनीक?

वर्चुअल रियलिटी का इस्तेमाल कई जगहों पर किया जाता है. लगभग हर उस जगह इस तकनीक का इस्तेमाल होता है, जहां सीखने-सिखाने वाला काम होता है. जैसे ड्राइविंग, स्पोर्ट्स, एजुकेशन. अब आप कहेंगे कि ड्राइविंग में इसका इस्तेमाल कैसे होता है. तो सबसे पहले शुरू से समझिए.

ऑफिशियली गाड़ी चलाने के लिए सबसे पहले क्या चाहिए? आप कहेंगे गाड़ी. लेकिन गाड़ी सड़क पर लेकर उतरे तो? सबसे पहले चाहिए होगा लाइसेंस. तभी तो ऑफिशियली कहा. तो लाइसेंस के लिए अप्लाई करना होता है. उसके बाद आपका होता है ड्राइविंग टेस्ट. इसके लिए रीज़नल ट्रांसपोर्ट ऑफ़िस के पास होती है अपनी जगह. वहां विभाग की गाड़ी चलाकर बताना होता था कि आपको गाड़ी चलानी आती है. आड़ी-तिरछी सब तरह से गाड़ी चलवाकर देखने के बाद आपको ड्राइविंग टेस्ट में फेल-पास करता था ऑफिसर. इसके लिए चाहिए एक बड़ी-सी सड़कनुमा जगह. वहां रियल गाड़ी चलवाई जाती थी.

लेकिन अब ऐसा नहीं होता. कई RTO दफ़्तर अब इस तरह टेस्ट नहीं कराते. अब टेस्ट होते हैं RTO के अपने दफ्तरों में. न गाड़ी चाहिए, न ही सड़क. अब वर्चुअल टेस्ट होते हैं. एक बक्सानुमा सेट में कैंडिडेट जाकर बैठता है. सामने स्क्रीन पर वर्चुअल सड़क होती है. आभासी सड़क. जो असल में होती नहीं है. लेकिन आपकी आंखों पर लगे VR सेट की वजह से सामने सड़क दिखाई देती है. बक्से में आपकी सीट के पास सब सेट-अप वैसा ही होता है जैसे गाड़ी में. आपकी स्किल्स जांचने के लिए मशीन होती है, जिस पर आपकी ड्राइविंग के आंकड़े दर्ज होते हैं. यही मशीन बताती है कि टेस्ट में क्या लेवल रहा.

# खेल में भी होता है इसका खेल

आप सोचेंगे कि वर्चुअल रियलिटी का खेल में क्या काम. खेल तो दौड़ने भागने कूदने का काम है. लेकिन यहां भी VR सिस्टम बहुत काम आता है, क्योंकि खिलाड़ी को करनी होती है खेल की प्रैक्टिस. अब जैसे क्रिकेट की प्रैक्टिस के लिए खिलाड़ी को मैदान जाना पड़ता है. वर्चुअल रियलिटी तकनीक में खिलाड़ी VR सेट पहनकर प्रैक्टिस कर सकता है. उसको अपने सेट के लेंस पर पिच दिखाई देगी. उसके हाथ में पकड़े बल्ले में होगा लेज़र बीम सिस्टम. सामने से आती बॉल को खिलाड़ी वर्चुअल स्टेडियम में कहीं भी मार सकता है. अब तकनीक इतनी आगे बढ़ गई है कि टेबल टेनिस जैसे खेल में VR सिस्टम के साथ ही आपको सामने वाला खिलाड़ी भी मिलता है.

तो इस तरह वर्चुअल रियलिटी ने स्पोर्ट की दुनिया को भी बहुत हद तक बदला है.

चाहे तो जंगल में शिकार करने का फ़ील भी ले सकते हैं वर्चुअल शूटिंग रेंज में
चाहे तो जंगल में शिकार करने का फ़ील भी ले सकते हैं वर्चुअल शूटिंग रेंज में

# वर्चुअल हवाई जहाज़ भी होते हैं

हवाई जहाज कौन उड़ाता है? पायलट. लेकिन सीखने-सिखाने के मामले में होता है बड़ा ख़तरा. कुछ भी गड़बड़ हुआ, तो करोड़ों रुपए का हवाई जहाज़ तो ख़तरे में पड़ेगा ही, साथ ही पायलट की ज़िंदगी भी दांव पर लगेगी. इसलिए वर्चुअल रियलिटी से पायलट ट्रेनिंग कराई जाती है. इसमें पायलट के सामने वैसी ही स्क्रीन होती है, जैसी हवाई जहाज़ में बैठने पर होती. और अपने वीआर सेट पर पायलट को हवाई जहाज़ उड़ाने जैसा ही महसूस होता है. इस तरह से ये तकनीक ख़तरे को बहुत कम कर देती है.

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