लाल रंग के कपड़े में किसने रखा था देश का बजट और कैसे इसका नाम पड़ा बही-खाता?

1 फरवरी 2020. सीतारमण बजट पेश करने जा रहीं थीं तो बजट चमड़े के बैग में नहीं बल्कि लाल रंग के एक कपड़े में रखा हुआ था और उस कपड़े पर अशोक की लाट बनी हुई थी. 2019 में इसे नाम दिया गया बही-खाता. 2019 तक होता ये आया था कि बजट को एक चमड़े के बैग में लेकर जाया जाता था.

बजट चमड़े के बैग में न होकर लाल रंग के कपड़े में क्यों था, इसको लेकर अलग-अलग कयास लगाए जा रहे थे. भारत के चीफ इकनॉमिक एडवाइज़र के. सुब्रमण्यम ने बताया था कि लाल रंग शगुन यानी शुभ का प्रतीक होता है. इसीलिए वित्त मंत्री की बजट वाली फ़ाइल लाल रंग की है. यह पश्चिमी विचारों की गुलामी से निकलने का प्रतीक है. लेकिन पिछले साल निर्मला सीतारमण ने बताया था कि बजट चमड़े के बैग में न होकर लाल रंग के कपड़े में क्यों था.

6 जुलाई 2019 को पत्रकारों से बातचीत में निर्मला सीतारमण ने बताया-

”भारत के किसी भी हिस्से में जाइए, वहां बही-खाते को लाल रंग के कपड़े में रखने की परंपरा है. दक्षिण भारत में लक्ष्मी पूजा के दौरान इसी तरह से हिसाब-किताब की कॉपी लाल रंग के कपड़े में लपेटकर रखी जाती है. गुजरात और महाराष्ट्र में दिवाली पूजा के अगले दिन और असम में बिहू के वक्त ऐसा ही किया जाता है. ये हमारी परंपरा है. ब्रीफकेस में बजट ले जाना हमारी परंपरा नहीं है. ब्रीफकेस इसलिए ले जाया जाता है ताकि उसमें रखने पर कागज़ न गिरें, लेकिन कागज़ों को गिरने से बचाने के लिए उन्हें लाल कपड़े में भी बांधा जा सकता है. इसलिए मैंने सोचा कि बजट को लाल रंग के कपड़े में ले जाया जाए.”

बजट के लिए लाल रंग का कपड़े की पोटली तैयार की गई थी. निर्मला सीतारमण ने इसके बारे में भी बताया. उन्होंने कहा-

”अपना बजट भाषण रखने के लिए मैंने लाल रंग का एक बुक कवर मंगवाया था. मेरे घर में मेरे साथ मामा-मामी भी रहते हैं. मामी ने देखा कि बुक कवर में क्लिप नहीं है. मामी ने कहा कि ऐसे तो कागज़ गिर जाएंगे. इसके बाद उन्होंने लाल रंग के कपड़े से ही एक फोल्डर बना दिया और फिर लाल कपड़े का बस्ता जैसा सिल दिया, जिससे कोई कागज़ न गिरे.”

निर्मला ने आगे बताया था-

”मेरे मामा-मामी लंबे समय से मुंबई में रहते हैं. उनका सिद्धिविनायक मंदिर और महालक्ष्मी मंदिर से गहरा जुड़ाव है. मामा-मामी बजट की इस पोटली को लेकर मंदिर गए. वहां दर्शन के बाद जब ये मेरे पास वापस आया, तो मैंने इसपर भारत का राजचिन्ह और सत्यमेव जयते लिखी अशोक की लाट लगवाई, जिसके बाद ये ऑफिशियल हो गया. जब मैं इसे लेकर संसद पहुंची तो लोगों ने इसे बही-खाते का नाम दे दिया.”

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