सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया गैंगरेप दोषियों के लिए क्यों कहा- थोड़ी तो मानवीय संवेदना रखिए

सुप्रीम कोर्ट ने 2012 के निर्भया गैंगरेप केस के दोषियों को अंगदान का विकल्प देने की याचिका खारिज कर दी. इस याचिका में मांग की गई थी कि दोषियों को अंगदान करने दिया जाए. इसी याचिका में लाश को मेडिकल रिसर्च के लिए देने का विकल्प भी मांगा गया था, जो सुप्रीम कोर्ट ने खारिज़ कर दिया. ये याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट के एक पूर्व जज ने दायर की थी.

# क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?

जस्टिस आर. भानुमति और जस्टिस ए. एस. बोपन्ना की पीठ ने कहा-

जनहित याचिका के जरिए आप ऐसा निर्देश देने का अनुरोध नहीं कर सकते. अगर दोषी ऐसा करना चाहते हैं, वे खुद या अपने परिवार के सदस्यों के जरिए इस बारे में अपनी इच्छा व्यक्त कर सकते हैं.

# याचिका दायर करने वाले ने क्या कहा?

याचिकाकर्ता थे बॉम्बे हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जस्टिस माइकल एफ. सल्दाना. इनके वकील याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के सामने दलील दे रहे थे. वकील का कहना था कि अंगदान करके दोषी मानवता के लिए कुछ तो अच्छा करके जा सकेंगे. लेकिन इस दलील से सुप्रीम कोर्ट सहमत नहीं हुआ. सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि पूर्व जस्टिस की याचिका गलत अवधारणा पर आधारित है.

पीठ ने कहा-

किसी व्यक्ति को फांसी दिया जाना उसके परिवार के लिए बहुत ही दुखद है. याचिकाकर्ता के तौर पर आप चाहते हैं कि दोषियों के शव के टुकड़े किए जाएं. थोड़ी तो मानवीय संवेदना रखिए. अंगदान स्वेच्छा से होता है.

याचिकाकर्ता पूर्व जस्टिस सल्दाना ने शीर्ष अदालत से अनुरोध किया था कि मौत की सजा पर अमल से जुड़े सारे मामलों में इस तरह की शर्त लगाने पर विचार किया जाए.

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निर्भया गैंगरेप और मर्डर केस में चारों दोषियों को 3 मार्च, मंगलवार की सुबह फांसी होनी थी, जो टल गई. निर्भया केस में दोषी पवन गुप्ता की याचिका पर पटियाला हाउस कोर्ट में सुनवाई हुई. कोर्ट ने अगले आदेश तक फांसी पर रोक लगा दी है.

सुप्रीम कोर्ट में किसी दोषी की फांसी पर मुहर लगने के बाद फांसी से बचने के लिए उसके पास दो विकल्प होते हैं. दया याचिका- जो राष्ट्रपति के पास भेजी जाती है. और पुनर्विचार याचिका जो सुप्रीम कोर्ट में लगाई जाती है. ये दोनों याचिकाएं खारिज होने के बाद दोषी के पास क्यूरेटिव पिटीशन का ऑप्शन होता है. ये पिटीशन सुप्रीम कोर्ट में लगाई जाती है. इसमें कोर्ट ने जो सज़ा तय की है उसमें कमी के लिए रिक्वेस्ट की जाती है. यानी फांसी की सज़ा उम्रकैद में बदल सकती है.