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बजट पहले शाम पांच बजे क्यों पेश किया जाता था?

बजट पहले शाम पांच बजे क्यों पेश किया जाता था?
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मोदी सरकार का बजट आ गया. फरवरी के पहले दिन सुबह-सुबह. लेकिन ऐसा हमेशा से नहीं था. साल 1999 तक बजट पेश होता था फरवरी के आखिरी दिन. और वो भी दिन में नहीं, शाम को. शाम पांच बजे टू बी प्रिसाइज़. क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों था? हम बताते हैं.

बात ये थी कि बजट पेश करने की परंपरा 1947 से पहले की है. माने जब हम अंग्रेज़ों के गुलाम थे, तब भी बजट पेश होता था. लेकिन तब वो गुलाम भारत का बजट होता था जिसकी सर्वेसर्वा लंदन में बैठी अंग्रेज़ सरकार होती थी. तो यहां का बजट इस बात को ध्यान में रखकर पेश किया जाता था कि उसे ब्रिटिश संसद आराम से सुन सके. जब भारत में शाम के पांच बजते, तब ब्रिटेन में सुबह के 11.30 बजते. इस वक्त तक ब्रिटिश संसद में हाउस ऑफ कॉमन्स (वहां की लोकसभा) की कार्रवाई शुरू हो जाती और उसके पास ऑप्शन होता कि वो भारत में पेश हो रहे बजट को रेडियो पर सुन पाए. अंग्रेज़ों के जाने के बाद भी यही रवायत जारी रही.

मोरारजी देसाई अपने जन्मदिन (29 फरवरी) पर बजट पेश करने वाले इकलौते वित्तमंत्री हैं.
मोरारजी देसाई अपने जन्मदिन (29 फरवरी) पर बजट पेश करने वाले इकलौते वित्तमंत्री हैं.

तो फिर वक्त बदला क्यों?

ये बात दिमाग में आ सकती है कि बजट दिन के चाहे जिस घंटे पेश हो, क्या ही फर्क पड़ता है? लेकिन फर्क पड़ता था. पहला तो ये कि बजट भले शाम पांच बजे पेश होता था, लेकिन वित्तमंत्री दिन भर से व्यस्त ही रहते थे. और सदन में बजट पेश करने के बाद उन्हें मीडिया के लिए समय निकालना पड़ता था. सभी पत्रकारों के जवाब देते-देते आधी रात हो जाती थी. तो बजट लोगों के लिए अच्छा जाए या बुरा, वित्तमंत्री के लिए थका देने वाला ही होता था.

वित्तमंत्रियों को इस समस्या से निकालने का बीड़ा उठाया यशवंत सिन्हा ने. वो अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार में वित्तमंत्री थे. उन्होंने 1999 की जनवरी से ही वित्त मंत्रालय के अफसरों को बजट का समय बदने पर विचार करने को कह दिया. तब के वित्त सचिव विजय केलकर का भी यही मानना था कि बजट सुबह पेश हो तो बेहतर है. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी ये आइडिया पसंद आया.

यशवंत सिन्हा ने शाम को बजट पेश करने की रवायत तोड़ी और सुबह बजट पेश करना शुरू किया.
यशवंत सिन्हा ने शाम को बजट पेश करने की रवायत तोड़ी और सुबह बजट पेश करना शुरू किया.

इसके बाद यशवंत सिन्हा ने एक इस बाबत एक खत लोकसभा और राज्यसभा स्पीकर को लिखा. इसमें ये गुज़ारिश की गई थी कि बजट के दिन सुबह 11 बजे होने वाले प्रश्नकाल (क्वेश्चन आर) को रद्द कर दिया जाए. ये मांग मान ली गई. और इस तरह जब 27 फरवरी, 1999 को सुबह 11 बजे साल 1999-2000 का बजट पेश करने के लिए यशवंत सिन्हा खड़े हुए, एक नई रवायत की शुरूआत हुई.

वक्त के साथ कुछ और बदलाव भी हुए. पहले एक ही कॉपी में हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में बजट लिखा हुआ होता था. इससे एक बड़ा मोटा-सा बजट बनता था. इसकी जगह हिंदी और अंग्रेज़ी के लिए अलग-अलग कॉपी बनाई जाने लगीं. इसके अलावा बजट के साथ आने वाले दस्तावेज़ों के लिए भी कलर कोडिंग शुरू की गई. पहले सारे दस्तावेज़ सफेद कागज़ पर छपते थे. अब इनके लिए लाल, नारंगी और नीले रंग का इस्तेमाल किया जाता है ताकि इन्हें आसानी से पहचाना जा सके.

वित्त मंत्री अरुण जेटली हलवा सेरेमनी में.
वित्त मंत्री अरुण जेटली हलवा सेरेमनी में.

एक और बदलाव है, जो इन दिनों चल रहा है. सरकारें कोशिश कर रही हैं कि बजट फरवरी के आखिरी हफ्ते की जगह साल जनवरी में पेश किया जाए. इसके पीछे कारण ये दिया जाता है कि जनवरी में पेश होने से बजट पर सारी माथा पच्ची हर हाल में 1 अप्रैल से पहले पूरी हो जाएगी. इससे नया वित्तीय वर्ष (फाइनेंशियल ईयर) शुरू होते ही सारे सरकारी विभागों के पास स्पष्ट जानकारी होगी कि उन्हें कितना बजट मिला है, और उन्हें किस हिसाब से साल-भर के लिए योजना बनानी है.

बस एक रवायत है जो दशकों से बनी हुई है और उसमें कोई बदलाव नहीं चाहा गया है. वो है बजट से पहले होने वाली हलवा सेरेमनी. बजट सदन में पेश होने से पहले सरकार का एक गोपनीय दस्तावेज़ होता है. इसलिए इसे वित्त मंत्रालय अपनी प्रेस में खुद छापता है. बजट के छपने के दौरान उससे जुड़ा कोई भी कर्मचारी-अधिकारी वित्त मंत्रालय के परिसर से बाहर नहीं जा सकता. खाना-पीना सब अंदर ही होता है. तो इस मेहनत के काम की शुरूआत सभी को हलवा खिलाकर होती है. यही हलवा सेरेमनी है. इसमें वित्त मंत्री समेत वित्त मंत्रालय के सभी वरिष्ठ अधिकारी पहुंचते हैं.

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